शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

इटली से आया गिरगिट

इटली से आने वाले गिरगिटों की बात चलती है तो एक नाम अवश्य आता है - रॉबर्ट डि नोबिली.
इस नाम को कैथोलिक इसाई बड़े सम्मान से लेते हैं. ये सम्मान देने वालों में साधारण इसाई तो सम्मिलित हैं ही, इसाई मत के प्रचारक और पादरी जैसे फादर बीड ग्रिफ्फिथ, जूल्स मोंचानिन और हेनरी ली सॉक्स भी सम्मिलित हैं. जो पाठक इन नामों से अपरिचित हैं तो उन की जानकारी के लिए ये सभी नाम इसाई जगत में अत्यंत सम्माननीय हैं और इन्हें इसाई मत के महान संतों की उपाधि दी जाति है. ये लोग भारत में इसाई आश्रम चलाते रहे हैं अथवा चलाते थे.

इसलिए यदि इन इसाई आश्रमों का उद्देश्य और विचारधारा समझनी हो तो उनके आदर्श रौबर्ट डि नोबिली के जीवन का अध्ययन कर लेना चाहिए क्योंकि हम आदर्श तो तभी चुनते हैं जब हम भी उस जैसा कार्य करना चाहते हैं.

सन १५७७ में जन्में रौबर्ट ने १५९६ में घर से भाग कर सोसाइटी ऑफ जीसस से पादरी बनने की शिक्षा ग्रहण की जो कि १६०३ में पूर्ण होने पर उसे पादरी बना दिया गया और अगले वर्ष इसाई मत का प्रसार करने के लिए एक मिशनरी के रूप में भारत भेज दिया गया.

दो वर्ष बाद, सन १६०६ में उसे मदुराई मिशन का मुखिया बना दिया गया जहां उसने अगले ५० वर्ष तक मिशनरी गतिविधियाँ चलाईं.

जिस समय नोबिली भारत आया तो भारत में इन्क़ुइसिशन की बर्बरता को आरम्भ हुए चार दशकों से ऊपर हो चुके थे और हिन्दुओं के मन में क्रूर इसाई मत के प्रति उपेक्षा तथा घृणा थी. परिणाम स्वरुप, रौबर्ट से पूर्व वहाँ का पादरी फादर फर्नांडिस गत एक दशक में एक भी हिन्दू को इसाई नहीं बना पाया था.

रौबर्ट के चतुर मस्तिष्क ने देखा कि साधारण हिन्दू , पुरुष और महिलायें, ब्राह्मणों को सम्मान देते थे और इसी के आधार पर उसने अपना षड्यंत्र रचा, जिसका उल्लेख उसने तत्कालीन पोप पॉल पंचम को लिखे पत्र में मिलता है. रौबर्ट के अनुसार:
मैंने हर वो प्रयत्न कर के देख लिया है जिस से कि मैं इन मूर्ती पूजा करने वालों को यीशु के मत में ला सकूं किन्तु मेरे सभी प्रयास विफल सिद्ध हुए हैं. ये हिन्दू अपने पूर्वजों के सनातन धर्म को पूर्ण विश्वास से पकडे हुए हैं और इन वहशियों ने पुर्तगालियों की शैली से मुंह फेर लिया है. ये कई ब्राह्मणों का अत्याधिक सम्मान करते हैं क्योंकि ये ब्राह्मण एक कठोर और सादा जीवन जीते हैं. ये हिन्दू उन ब्राह्मणों के ऐसे देखते हैं मानो वो आकाश से उतारे कोई देव पुरुष हों. 
अगला वाक्य सब से महत्वपूर्ण है:
मुझे लगता है कि मैं गौड की सहायता से यही कुछ कर पाऊंगा जो इन धूर्तों ने चालाकी से किया है ताकि संसार का यश प्राप्त हो सके.
S. Rajamanickam, 'Goa Conference of 1619', Indian Church History Review, December, 1968, p. 85
 इस वाक्य का अर्थ है कि ये इसाई एक ब्राह्मण का स्वांग धर कर हिन्दुओं को ये धोखा देगा कि वो भी एक ब्राह्मण है. परिणामस्वरूप, उसे भी मान सम्मान मिलेगा और वो हिन्दुओं को धोखे से इसाई मत में ले आएगा.

 अपनी इसचाल को सफल बनाने में उसे बाधा ये थी कि चर्च, जोकि ब्राह्मणों से घृणा करती थी, ने निर्देश दे रखे थे कि कोई भी इसाई न तो यज्ञोपवीत (जेनेयु) पहनेगा और न ही चुटिया रखेगा. इन्कुइसिशन के नियमों के अनुसार इसके लिए मृत्युदंड भी दिया जा सकता था. अपनी चाल के लिए उसने अपने वरिष्ठ अधिकारी क्रैन्गानोर के आर्कबिशप  को अपने उद्देश्य से अवगत कराया तो आर्कबिशप  ने स्वीकृति के लिए प्रस्ताव गोवा में स्थापित सर्वोच्च अधिकारी इन्कुइसीटर को भेजा.

यदि आप ये सोच रहे हैं कि कोई धर्म और उसके पवित्र अनुयायी ऐसी धूर्तता पूर्ण योजना को नकार देंगे तो आप ने अभी तक इसाई मत को ठीक से नहीं समझा है. चिंता मत कीजिये, मेरा भी यही मत था जब तक मैं इसाइयत को ठीक से नहीं समझता था. इन दोनों, इसाई मत की शब्दावली में, होली (पवित्र) अधिकारियों ने इस धोखा धड़ी की अनुमति दे दी.

रौबर्ट, जो कि तमिल और संस्कृत सीख चुका था, होली चर्च  से हरी झंडी मिलते ही गेरुआ वस्त्र पहने, छोटी रखे और जनेऊ धारण किये हिन्दुओं में आ पहुंचा. अपने तन पर चन्दन का लेप भी करने लगा और अपनी गोरी त्वचा के लिए उसने कहा कि वो है तो ब्राह्मण किन्तु उसका जन्म रोम में हुआ था और उसने वहीं ज्ञान प्राप्त किया था. दक्षिण भारत में मदुरई नगर की सीमा पर एक हिन्दू मंदिर जैसा आश्रम बनाया और उसमें इसाई पद्दति के मॉस  को  पूजा का नाम दे दिया. स्थानीय निवासियों से कहा कि वो एक ब्राह्मण है और जो उसका शिष्य बनाना चाहे, वो बन सकता है. इस प्रकार जो उसके शिष्य बने, उन अभागों को ये भनक भी नहीं थी कि उन्हें मूर्ख बना कर मत परिवर्तन किया जा रहा है.

उस में  उन दिनों मुसलामानों के अत्याचार हिन्दुओं पर चलते कई शताब्दियाँ हो चुकी थीं और रौबर्ट की जानकारी में आया कि हिन्दू मत के सर्वोत्तम ग्रन्थ वेद माने जाते हैं और उन की मूल प्रतियां मुसलामानों ने या तो नष्ट कर दी हैं अथवा कहीं खो गयी हैं.

इस सूचना ने हमारे प्यारे सेंट रॉबर्ट डि नोबिली  को एक नई राह दिखा दी. संस्कृत तो वो सीख ही चुका था. उसने इसाई मत की कहानियों से एक पुस्तक बनायी और उसका नाम रखा यजुर्वेद. ये इस महान इसाई सेंट  की शास्त्रों के सन्दर्भ में पहली धोखा धड़ी नहीं थी. इस से पहले भी वो कई पुस्तकें संस्कृत में लिख चुका था और उनमें भी इसाई मत की कहानियां ही थीं. इनमें जो इसाई चरित्र थे, उनके नामों को तोड़ मरोड़ कर संस्कृत लगने वाले अथवा तमिल लगने वाले नाम रख दिए. ये क्रम लगभग छः वर्ष तक निरंतर चला और इतिहासकार सीता राम गोयल के अनुसार उसने लगभग १२० हिन्दुओं को अपना अनुयायी बना लिया था, जिन में १२ ब्राह्मण भी थे जिनमें २ महिलाएं और २ बच्चे भी थे.

सन १९९९ में जब पोप ने घोषणा की थी कि पहले हज़ार वर्षों में इसाइयत ने यूरोप को जीता था, अगले हज़ार वर्हों में अफ्रीका और अमेरिका को जीता था, आने वाले हज़ार वर्षों में एशिया में आत्माओं की खेती की जायेगी तो उसका उद्देश्य एशिया को इसाई बनाना ही था. ये 'आत्माओं की खेती' की भूख नोबिली के समय भी इतनी ही प्रघाढ़ थी. इसी भूख के चलते, नोबिली के प्रतिद्वंद्वी मिशनरी उसके छल की निंदा करने लगे. कुछ ने दुष्प्रचार कर दिया कि नोबिली ने इसाइयत को त्याग दिया है और हिन्दू बन गया है जबकि दास वर्ष तक असफल रहे फादर फर्नांडिस  ने अपने उच्च अधिकारियों को नोबिली की गतिविधियों पर आपत्ति जताते हुए कई पत्र लिखे. अंततः गोवा स्थित आकाओं को स्थिति में हस्तक्षेप करना पड़ा.

सन १६१३ में उसे आकाओं की ओर से स्पष्ट दिशा निर्देश थमा दिए गए जिन के अनुसार मॉस  को पूजा नहीं कहना था और मॉस  ही कहना था. जब कोई इसाई मत अपनाता है तो उस समारोह को बैपतिस्म  कहते हैं लेकिन रॉबर्ट इसे हिन्दुओं को मूर्ख बनाने के लिए 'संस्कार' कहता था. नए निर्देशों के अनुसार इस बैपतिस्म ही कहना था. मांस भक्षण इसाई पंथ के लिए आवश्यक है इसलिए रॉबर्ट को शाकाहारी नहीं रहना था. और सन्यासियों की वेश भूषा आपत्तिजनक थी.

रॉबर्ट डि नोबिली को जब ये निर्देश मिले तो उसे लगा कि उसका ये खेल समाप्त हो जाएगा जो वो नहीं चाहता था क्योंकि अब तक शेर के मुंह को खून लग चुका था. उसने अपने बचाव का निर्णय किया और अपने पक्ष को सुदृढ़ बनाने के लिए अपने से पहले के होली फादरों  के उदाहरण निकाल लिए. इस प्रकार के उदाहरण ढूँढने के लिए उसे अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा होगा क्योंकि ये किसी इसाई पादरी द्वारा किया गया पहला धोखा तो था नहीं.

उसे अपने लिए उपयुक्त एक उदाहरण तो बाइबल के एक महानतम सेंट पॉल  का ही मिलता था.  बाइबल (Acts 16:3) के अनुसार सेंट पॉल ने अपने एक शिष्य टिमोथी का खतना किया था जब उसे ले कर यहूदियों की बस्तियों में बाइबल के प्रसार के लिए जाना था, ताकि यहूदीयों को लगे कि टिमोथी भी एक यहूदी ही है. अर्थात यदि पॉल जैसा सेंट धोखा धड़ी कर सकता है तो रॉबर्ट भी कर सकता है. इस को पुख्ता बनाने के लिए उसने चौथी तथा पांचवीं सदी में रोम के आर्कबिशप  रहे जौहन क्रिसौसटम का उदाहरण दिया जिस ने सेंट पॉल की इस गतिविधि की प्रशंसा करते हुए कहा था कि टिमोथी का खतना इसलिए किया गया था ताकि खतना करने की परंपरा (यहूदियों) को मिटाया जा सके. रॉबर्ट के अनुसार इसी प्रकार चोटी रखना और भगवा वस्त्र पहनना मूर्ती पूजा का भाग नहीं है इसलिए हिन्दू धर्म को नष्ट करने के लिए इन चिन्हों को हिन्दू धर्म से विलग किया जा सकता है.

इसे हिन्दुओं का दुर्भाग्य कहें अथवा रॉबर्ट नोबिली का सौभाग्य कि उसकी गतिविधियों पर विरोध करने वाले उच्चाधिकारी  की मृत्यु हो गयी और रॉबर्ट अपने स्वांग में बना रहा. उसके विरोधियों ने अब सीधे पोप को पत्र लिख कर रॉबर्ट के ढोंग से अवगत करवाया, जिसके परिणाम स्वरुप, पोप ने गोवा में स्थित मुख्य इन्कुइसितर को एक समिति गठित कर के रॉबर्ट की गतिविधियों का निरिक्षण करने को कहा. सन १६१९ की फरवरी के माह में रॉबर्ट को समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने को कहा गया और रॉबर्ट ने अपने पक्ष में बाइबल के उदाहरण प्रस्तुत किये. किन्तु उसके विरोधी, पोप को लिखे पत्र में भी बाइबल से लिए गए उदाहरणों का उल्लेख कर चुके थे जो रॉबर्ट के क्रिया कलापों को चर्च के मत के विरुद्ध सिद्ध करते थे. समिति ने रॉबर्ट के विरुद्ध निर्णय दिया और उसे ढोंग के कई रूप त्यागने को कहा.

रॉबर्ट ने इस निर्णय के विरुद्ध, पोप को एक पत्र लिखा जिस में उसने वास्तविकता बताते हुए लिखा:
अभी तक जितने भी हिन्दुओं को इसाई बनाया गया है, वो केवल बलपूर्वक किया गया है और ये मत परिवर्तन केवल उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित है जहां कि पुर्तगालियों की तलवार और शस्त्रों का सम्मान होता है. ये क्षेत्र केवल तटीय प्रदेशों में हैं जहां तक कि पुर्तगाली नौसेना की वीरता से इसाई मत का प्रकाश पहुँच सका है. तट से दूर रहें वाले भारतीय अभी भी अन्धकार तथा मूढ़ता में डूबे हुए हैं. यहाँ चारों ओर, जहां तक दृष्टि जाति है, हमारे लिए अवसर हैं कि हम यहाँ अपने मत का विस्तार कर सकें. (यहाँ रॉबर्ट ने उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया है जो १९९९ में पोप ने एशिया के लिए किया था - आत्माओं की खेती)

अपनी धोखा धड़ी को उचित ठहराने के लिए उसने लिख दिया कि हिन्दू तो इसाई मत को अपनाने के लिए मरे जा रहे हैं किन्तु उन्हें भय है कि ऐसा करने से उन्हें समाज से निष्कासित कर दिया जाएगा इसलिए वो इसाई रहन सहन नहीं अपनाना चाहते. इसलिए उसके इस स्वांग को चलने दिया जाए क्योंकि इस से हिन्दुओं को इसाई बनाया जा सकता है. इसके लिए उसने पोप को लिखा कि वो 'पोप के चरणों का दास है' और पोप को 'अपनी सहनशीलता तथा उदारता' का परिचय देना चाहिए. इस से पहले कि पोप पॉल पंचम  कोई निर्णय दे पता, उसकी भी मृत्यु हो गयी. नए पोप  ग्रेगरी १५ ने रॉबर्ट को धोखा धड़ी चलाये रखने की अनुमति दे दी. इसके पश्चात तो मदुरई मिशन ने एक के बाद एक मिशनरिओन को हिन्दू सन्यासियों के भेष में धोखा करने की छूट दे दी.

जब रॉबर्ट द्वारा शिष्य बनाए गए हिन्दुओं को इस स्वांग की जानकारी मिली तो वे फिर से हिन्दू धर्म में लौट आये. ये देख कर उसके सहयोगी फादर प्रोएंका  को इतनी मायूसी हुई कि उसने अपने वार्षिक पत्र में लिखा:
 मेरे पाठकों में यदि कोई ऐसे किसी लेप अथवा रसायन की जानकारी रखता हो जिसे शरीर पर लगाने से हमारा रंग सांवला हो जाएगा तो मुझे अवश्य सूचित करे. यदि उसका प्रभाव स्थाई है तो भी हमें स्वीकार्य है. हम अपने मिशन और यीशु के लिए हब्शी बन कर रहने के लिए भी तत्पर हैं. ये आवश्यक नहीं है कि हमारा रंग काला हो जाए, अधिक उपयुक्त होगा यदि हमारा वर्ण काले और गेहुएं के बीच का हो जाए. इस से हम उन्हीं जैसे लगने लग जायेंगे, जिन के मध्य में हम रहते हैं. 
इसके लिए इस इसाई फादर  को महान इसाई सेंट क्लेमेंट  और सेंट औगास्तिन से मिली थी जो अपने मिशन की सफलता के लिए गिरने को उचित मानते थे.

इसाई विचारधारा और इसे चलाने वाले कैसे हैं ये रॉबर्ट डि नोबिली की गतिविधियों और उन्हें दिए गए संरंक्षण से स्पष्ट हो जाता है. ये एक धर्म्खोर विचारधारा है जो दीमक की भांति हिन्दू सभ्यता को चाट रही है और सेकुलरिस्म के नाम पर गांधी कुनबा इस दीमक को बढ़ावा दे रहा है. यदि हम सचेत नहीं हुए तो जैसे आज अन्य पुरानी और सहनशील सभ्यताओं  जैसे रोम, मिस्र, माया, इन्का तथा उनानी सभ्यताओं का नाश इसाइयत ने किया है, हिन्दू सभ्यता का भी समूल नाश हो जाएगा. हमें आज इसाई स्कूलों के माध्यम से सिखाया जाता है कि सभी मत एक सी ही शिक्षा देते हैं इसलिए गौड और परमात्मा एक हैं, केवल पुकारने का नाम भिन्न है.

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