गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

ब्राह्मण: रक्षक या भक्षक

चीन का विद्यार्थी, फा हीन, सन ३९९ से लेकर ४१४ तक, लगभग १५ वर्ष भारतवर्ष में रहा. उसे अपने मूल निवास चांग-गन से भारत आने में छः वर्ष तक यात्रा करनी पड़ी थी जो अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि भारत की ख्याति एक विद्या के केंद्र के रूप में फैली हुई थी. 


 हयून सांग, एक और प्रसिद्द चीनी यात्री, भारत में सन ६३० में आया था. वो भारत और यहाँ के ब्राह्मणों के संबंध में लिखता है
 विद्वानों (वेद के ज्ञाता) ने अत्यंत ध्यानपूर्वक वेदों के गहन नियमों को पढ़ा होगा, तभी इनका गहन अर्थ समझ पाए.फिर वे उनका अर्थ सामान्य ढंग से बताते हैं, और अपनी छात्रों को कठिन शब्दों को समझने में सहायता करते हैं. वो उन्हें उत्साहित करते हैं और कुशलता से उनका संचालन करते हैं. वो छात्रों के अल्प ज्ञान में वृद्धि करते हैं और यदि कोई हताश होता है तो उसका मार्गदर्शन करते हैं. 
दिन प्रश्नों के लिए छोटे पड़ जाते हैं. वे सुबह से रात तक विचार और वार्ता करते हैं. युवा और वृद्ध एक दूसरे की परस्पर सहायता करते हैं.
लाइफ ऑफ हयून सांग - सैमुअल बील खंड १ पृष्ठ ७९, खंड २, पृष्ठ १७० 

 प्रसिद्द फ्रांसीसी अलैन दैनिएलौ, जिस ने भारत के इतिहास, दर्शन और धर्म पर कई पुस्तकें लिखी हैं, के अनुसार:
हयून सांग नालंदा में पांच वर्ष तक रहा, जहां ७००० से अधिक भिक्षु रहते थे. वो भारी संख्या में संस्कृत साहित्य और इतिहास, भूगोल और सांख्यिकी की पुस्तकों का उल्लेख करता है. इन में से आज कुछ भी नहीं बचा है. वो उन अधिकारियों का भी उल्लेख करता है, जिन का दायित्व सभी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को अंकित करना था. नालंदा में वेद, उपनिषद, संख्या, वैशेषिक, तर्क, न्याय जैसे विषय पढाए जाते थे. इन के अतिरिक्त व्याकरण, आयुर्वेद, भौतिकी तथा यांत्रिकी के अतिरिक्त जैन और बौध मत का भी अध्ययन होता था. दवाएं अत्यंत प्रभावकारी होती थीं और शल्यचिकित्सा भी अत्यंत विकसित थी. खगोल विज्ञान भी अत्यंत विकसित था. पृथ्वी के परिमाप की सटीक गणना कर ली गयी थी और भौतिकी में ब्रह्मगुप्त नें गुरुत्व का नियम खोजा था. 
पृष्ठ १६५-१६६ - अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ इंडिया 

युआन चवांग, एक और चीनी विद्यार्थी, जो नालंदा विश्व विद्यालय में ६२९ से ६४५ तक पढने के लिए आया था, लिखता है:
 इस अधिष्ठान में सैंकड़ों बंधू हैं, सब के सब विद्वान् और कुशल हैं, इन में से कई अत्यंत प्रसिद्द और प्रतिष्ठित हैं; सभी बंधू अपनी व्यवस्था के उपदेशों और नियमों का पालन, विधिपूर्वक करते हैं. पढने में और तर्क वितर्क में उन्हें दिन अपर्याप्त लगता है. वो एक दूसरे को दिन रात ताड़ते हैं, छोटे बड़े, सभी एक दूसरे की सहायता करते हैं. विदेशों से भी विद्यार्थी यहाँ आते हैं, नालंदा के नाम से जहां भी जाते हैं, उन्हें सम्मान मिलता है.
  थोमस वाटर्स खंड - २, पृष्ठ १६५ 
मार्को पोलो एक ऐसा यात्री था, जिसने तेरहवीं शताब्दी के विश्व के कई स्थानों का भ्रमण किया था. ये इटली के वेनिस नगर से आया यात्री भारत के ब्राह्मणों के संबंध में लिखता है:-
भारत के ब्राह्मण अति सम्माननीय हैं जो कि धोखाधड़ी से घृणा करते हैं और किसी और की वस्तु लेने को नीच कार्य समझते हैं. वे इस लिए भी विशिष्ट हैं क्योंकि वे एक ही पत्नी के साथ संतुष्ट रहते हैं. 
मार्को पोलो पृष्ठ २९८


आज जहां इराक है, वहाँ के मुसलामानों के संबंध में मार्को पोलो लिखते हैं
उन के मत के अनुसार, जो भी किसी अन्य सम्प्रदाय से लूटा जाता है अथवा चोरी किया जाता है, वो उनका अपना हो जाता है. इनके मत में चोरी कोई पाप नहीं है. इनमें से जो ईसाईयों के हाथों मारे जाते हैं, उन्हें शहीद कहा जाता है. इसलिए, यदि शासकों द्वारा इन्हें रोका नहीं गया तो ये बहुत से अत्याचार करेंगे. 
मार्को पोलो पृष्ठ ६३


अहमद, जो उन गिने चुने मुसलामानों में था जिन  का कुबलई खान पर प्रभाव है, स्वभावतः ही अन्य सम्प्रदाय के लोगों पर अत्याचार किया करता था. वो जिसे मन करता, मौत के घात उतार देता, उनका धन और संपत्ति लूत लेता, और सबसे बुरा ये था कि वो और उसके पुत्र कई महिलाओं से बलात्कार करते थे और उन्हें उपस्री बनने पर बाध्य कर देते थे. अहमद के इन अत्याचारों के कारण अंततः किसी ने उस का वध कर दिया. जब कुबलई खान को अहमद के अत्याचारों का पता लगा, तो उसका ध्यान उसके सम्प्रदाय के मत की ओर गया, जिस में हर प्रकार के अपराध को, वो हत्या ही क्यों न हो, को बुरा नहीं समझा जाता था, यदि वो दूसरे सम्प्रदाय के विरुद्ध हो.                         
मार्को पोलो पृष्ठ १६३ 
ये कुछ विश्व प्रसिद्द व्यक्तियों के भारत की शिक्षा प्रणाली और शिक्षकों के संबंध में विचार थे. ये यात्री भिन्न स्थानों से और भिन्न काल खण्डों में आये थे. भारत में विश्व के प्राचीनतम और आधुनिकतम विश्व विद्यालाय थे.
ये महान विश्व विद्यालय कहाँ गए?
इन विद्यालयों का नाश कर दिया गया और नाश करने वाले भी विदेशी थे. 


इख्तियारुद्दीन बख्तियार खिलजी को क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने बिहार सहित सारा पूर्वी भारत लूटने के लिए नियुक्त किया था. इसने ११९७ से १२०२ तक पूर्व भारत में आतंक मचाया और नालंदा, उदान्तपुरी और विक्रमशिला विश्व विद्यालयों को नष्ट कर दिया.  उस का समकालीन इतिहासकार मिन्हास सिराज लिखता है:-
इस स्थान के बहुत से निवासी ब्राह्मण थे और इन सभी ब्राह्मणों के सर मुंडे हुए थे. इन सब को मार दिया गया. वहाँ बहुत सी किताबें थी; मुसलामानों ने हिन्दुओं को बुलाया ताकि इन किताबों की जानकारी ले सकें;लेकिन सभी हिन्दू मार दिए गए थे. ये सारा स्थान एक महा विद्यालय था, जिसे यहाँ के लोग हिंदी भाषा में विहार कहते थे.
मुसलमान जहां भी आक्रमण करते थे, पुरुषों की हत्या कर देते थे और महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लेते थे. महिलाओं और बच्चों को मुसलमान बना दिया जाता था. बच्चों में जो लड़के होते थे, उनके अंग भंग कर के उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था और हरम की रखवाली में रख दिया जाता था.

मोहम्मद बिन कासिम से लेकर अंतिम मुग़ल तक, जितने भी मुसलमान आक्रमणकारियों ने भारत पर हमले किये, सभी का उद्देश्य, भारत का वैभव और महिलाएं लूट कर ले जाना और इस्लाम की स्थापना था. ब्राह्मण मुसलमान सम्प्रदाय का सबसे बड़ा रोड़ा थे क्योंकि वे पढ़े लिखे और निःस्वार्थी होते थे. इसलिए उन्हें विशेष रूप से प्रताड़ित और समाप्त किया जाता था. फ़िरोज़ तुग़लक और सिकंदर लोदी ब्राह्मणों से विशेष घृणा करते थे. उन के अनुसार:-
ज़ुन्नार्दारान कलिद इ हुजरा इ कुफ्र उन्द व कफिरान बार एषां मुआत्किद उन्द;
तारीख ऐ फ़िरोज़ शाही - शम्स सिराज अफ़िफ
ये वाक्य फ़ारसी भाषा का है. इसका अर्थ है कि ब्राह्मण कुफ्र की खान थे जिन में हिन्दुओं को विश्वास था. 
ये नए विदेशी ब्राह्मणों से किस प्रकार का व्यवहार करते थे, इस के लिए एक ब्राह्मण की हत्या का उदाहरण  इस प्रकार है:-
सुल्तान को सूचना मिली कि दिल्ली में एक ब्राह्मण (जुनारदार) है जो अपने घर में मूर्ती पूजा करता है और नगरवासी, जिन में हिन्दू और मुसलमान दोनों सम्मिलित हैं, उसके घर में मूर्ती पूजा करते हैं. इस ब्राह्मण ने एक लकड़ी की पट्टिका (मुह्रक) बना राखी है, जिसके सब ओर शैतानों और अन्य वस्तुओं के चित्र बने हुए हैं. निर्धारित दिन पर सभी काफिर, अधिकारियों की जानकारी में आये बिना उस के घर जा कर मूर्ती पूजा करते हैं. सुल्तान को बताया गया कि इस ब्राह्मण ने कई मुसलमान महिलाओं को काफिर बना दिया है. (जिन महिलाओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाता था, वो अवसर मिलने पर ऐसा कर लेती थीं). उस ब्राह्मण को उसकी पट्टिका सहित सुल्तान के समक्ष फिरोजाबाद में लाने का आदेश दिया गया. शेखों, उल्लेमा और इमामों को बुलाकर मंत्रणा की गयी. सभी का मत था कि इस संबंध में श्सरिया कानून स्पष्ट है: ब्राह्मण को मुसलमान बन जाना चाहिए अथवा उसे जला कर मार देना चाहिए. ब्राह्मण को सही ईमान के बारे में बता दिया गया और उसे उचित रास्ता बता दिया गया लेकिन उसने मानने से इनकार कर दिया. दरबार के द्वार पर सूअर की आँतों का ढेर लगाने का आदेश दिया गया. ब्राह्मण के हाथ पाँव बाँध कर उसकी पट्टिका सहित उसे ढेर में डाल कर आग लगा दी गयी. इस पुस्तक का लेखक वहाँ उपस्थित था और ये हत्या उसने देखी थी. आग पहले उसके पैरों तक पहुंची और उसकी चीख निकल गयी. शीघ्र ही आग ने उसे अपने में समा लिया. सुल्तान के न्याय और सादगी को देखो जो शरिया के नियमों से नहीं हटता.
सिकंदर  लोदी के शासन काल में भी इसी प्रकार एक ब्राह्मण की हत्या की गयी थी. उसका अपराध ये था कि उसने कहा था कि इस्लाम सच्चा है, लेकिन मेरा धर्म भी सच्चा है. ये घटना है संभल में कनेर की.
 फ़रिश्ता पृष्ठ ४१७ -४१८

यही लेखक फ़िरोज़ शाह द्वारा माता ज्वालामुखी के मंदिर पर किये आक्रमण के संबंध में ब्राह्मणों की दशा बताता है:-
जब इस ईमानवाले सुल्तान ने नगरकोट (कांगड़ा) में आक्रमण किया और ज्वालामुखी तीर्थ को लूटा तो सुल्तान ने मंदिर की मूर्तियों को तोड़ दिया और उन के टुकड़ों को गाय के मांस में मिला कर पुतलियों में दाल दिया और ये पोटलियाँ ब्राह्मणों के गलों में लटका दीं. मुख्या मूर्ती को मदीना भेज दिया ताकि मुसलमान उस पर से पाँव रख कर काबा के दर्शन करें.

औरंगज़ेब के शासनकाल में भी ब्राह्मणों ने पराजय को स्वीकार नहीं किया. जहां कहीं अवसर मिलता, वो अपने धर्म की स्थापना की चेष्टा करते रहते थे. औरंगज़ेब की मासिर इ आलमगिरी में इसका वर्णन मिलता है;
  ८ अप्रैल, १६६९
इस दिन ईमान के रक्षक सुल्तान को सूचना मिली कि कुछ काफिर ब्राह्मण मुल्तान और बनारस में अपने विद्यालयों में अपनी झूठी किताबें पढ़ा रहे हैं और उनके प्रशंसक, हिन्दू और मुसलमान, इन बेईमान लोगों से ये घिनौनी विद्या पढने के लिए दूर दूर से आते हैं. शहंशाह, जो इस्लाम के लिए सदा तत्पर रहता है, ने सभी राज्यपालों को आदेश दिया कि काफिरों के मंदिर और विद्यालय शीघ्रातिशीघ्र नष्ट कर दिए जाएं और इन काफिरों की पढ़ाने की प्रथा को समाप्त कर दिया जाए. 
मासिर इ आलमगिरी  पृष्ठ ५२ 

औरंगज़ेब के इस शाही फरमान के उपरान्त मुसलामानों ने कई मंदिर नष्ट किये और उनके स्थान पर मस्जिदें बना दी. ब्राह्मणों का अपमान विशेष रूप से किया जाता था. 

हिन्दुओं द्वारा ब्राह्मणों का वर्णन 


जयनन्द द्वारा लिखी गयी एक महान वैष्णव संत 'चैतन्य महाप्रभु' की जीवन कथा 'चैतन्य मंगल' में बंगाल के नवद्वीप में बसने वाले हिन्दुओं और ब्राह्मणों की दुर्दशा की व्याख्या करते है. वो लिखते हैं: 
राजा उन के घर लूट लेता है जो पवित्र धागा (जनेऊ अथवा यज्ञोपवीत) पहनते हैं और अपने मस्तक पर पवित्र तिलक लगाते हैं. वो मंदिरों को तोड़ देता है और तुलसी के पौधे उखाड़ देता है. गंगा में स्नान करना वर्जित कर दिया गया है. मुसलमान सैनिक, जहां भी वत वृक्ष देखते हैं, जिन्हें हिन्दू पवित्र मानते हैं, उन्हें काट दिया जाता है. ब्राह्मणों को बलपूर्वक मुसलमान बना दिया जाता है.
इस दशा पर खेद व्यक्त करते हुए वो लिखता है: मुसलामानों ने नदिया के कई महान ब्राह्मण परिवारों को नष्ट कर दिया है. परिणामतः, उच्च कोटि के ब्राह्मण वासुदेव, उनके पिता विशारद और उनका भाई विद्यावाचस्पति नदिया छोड़ कर उड़ीसा चले गए हैं. वो ब्राह्मण जिनका धर्म उनके मुंह में नीच भोजन (संभवतः गाय का मांस) डाल कर भ्रष्ट कर दिया गया है अब पिरिली ब्राह्मण कहे जाते हैं. हालांकि उनके मुंह में नीच भोजन डाल कर उनका सामजिक स्तर गिरा दिया गया है किन्तु उन्होंने इस्लाम नहीं अपनाया बल्कि हिन्दू ही बने रहे.

इसके कुछ दशकों के पश्चात विजय गुप्त कृत मंशार भाषण जो कि १४९४ में लिखी गयी थी, हमें कुछ और वर्णन मिलता है:
ब्राह्मणों को पवित्र धागा पहनना वर्जित कर दिया गया है. यदि कोई ब्राह्मण पवित्र तुलसी के पत्ते अपने सर पर पहनता है तो उसके हाथ पाँव बाँध कर मुसलमान काजियों के समक्ष दंड के लिए प्रस्तुत किया जाता है.
पठानों द्वारा बनाए गए एक कानून के अनुसार, हिन्दुओं से जिज़िया और खरज वसूल करने वाले मुसलमान अधिकारियों के मन में यदि हिन्दू के मुंह में थूकने की इच्छा हो तो हिन्दुओं को मुंह खोलना पड़ेगा. समकालीन बांगला साहित्य में मुसलामानों द्वारा हिन्दुओं के मुंह में थूकने के कई उल्लेख मिलते हैं.
 chaitanya and his age pp - 55
इसान नगर (अद्वैत प्रकाश के लेखक) द्वारा ब्राह्मणों की दशा का वर्णन है:

धूर्त म्लेच्छ कुत्तों की भांति तुलसी के पौधों पर पेशाब करते हैं और जान बूझ कर मंदिरों में जा कर शौच करते हैं. वो अपने मुंह से पानी भर कर पूजा कर रहे ब्राह्मणों पर फेंकते हैं.
भारत और यूरोप के बीच की भूमि पर इस्लाम पनप रहा था और फ़ैल रहा था. परिणामतः भारतवासियों पर जब मुसलमान ये अत्याचार कर रहे थे तो उन्होंने यूरोप से इसाई सम्प्रदाय के लिए एक बाधा खड़ी कर दी थी. सन १४९८ में वास्को डि गामा समुद्र के रास्ते कालीकट पहुंचा तो भारत के दुर्भाग्य में नया अध्याय जुड़ गया. ये पुर्तगाली, मार्को पोलो जैसा सभ्य नहीं था. इसके बेड़े में जो २५ नावें थीं, उनमें से १० नावें गोला बारूद से भरी हुई थीं. उसके सब साथी कट्टर इसाई थे और उन्हें पोप का आदेश था कि सब मूर्ती पूजा करने वालों को इसाई बनाना है.
जब ये डकैतों का बेड़ा कालीकट के बंदरगाह पर पहुंचा तो वहाँ २० पोत खड़े थे. वास्को के डकैतों ने इन्हें लूट लिया और इन के लगभग ८०० कर्मियों को बंधक बना लिया. फिर वास्को के आदेश पर इन सब के नाक, कान और हाथ काट कर इन्हें लोगों को दिखाया गया. सारे कटे हुए अंग के नाव में भर दिए गए. कालीकट के शासक ने एक ब्राह्मण को संदेश दे कर भेजा तो उसके भी नाक, कान और हाथ काट दिए गए और उसे कटे अंगों से भरी नाव में बैठा दिया गया.
जिस नाव में ८०० बंधक थे, उसमें उन्हें मार कर नाव को आग लगा दी गयी और खुले समुद्र में छोड़ दिया गया. ब्राह्मण की नाव को कटे अंगों सहित नगर की ओर शासक के लिए संदेश के साथ रवाना कर दिया गया. संदेश था कि इन अंगों से अपने लिए कड़ी बना लो.
जब स्थानीय शासक ने एक और ब्राह्मण को शान्ति संदेश के साथ भेजा तो वास्को ने उसके होंठ और कान काट दिए और उसके कानों के स्थान पर कुत्ते के कान सिल कर शासक के पास भेज दिया. इस ब्राह्मण के साथ उसके दो बेटे और एक भतीजा भी था. इन तीनों युवाओं को फांसी लगा कर मार दिया गया.
Empires of the Monsoon: A history of Indian ocean and its invaders by Richard Hall, pp - 198

यहाँ से आरम्भ हुआ इसाईओं का भारतवर्ष पर अत्याचार. पुर्तगाली और अँगरेज़ इसाईओं को भी समझते देर न लगी कि हिन्दुओं का विश्वास इनके धर्म ग्रंथों और विद्वानों से उत्पन्न होता है, इसलिए उन्होंने भी मुसलामानों की भांति ब्राह्मणों को निशाना बनाया.
सन १८१३ में जब अंग्रेज़ों की संसद इस पर विचार कर रही थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ इसाई मिशनरियों को भी भेजा जाए अथवा नहं, लॉर्ड मिन्टो, जो १८०७ से १८१२ तक भारत का गवर्नर जनरल रहा था, ने अपने अधिकारियों को दस्तावेज़ भेजे जो मिशनरी प्रयोग करते थे. इसमें एक पत्र के संबंध में उस का उल्लेख है कि 'ये ब्राह्मणों का नरसंहार करने का सुझाव है'.
अंग्रेज़ों ने हिन्दू धर्म को उखाड़ने के लिए जो नीति सन १८३५ में चुनी, उसका प्रभाव हमें आज देखने को मिल रहा है. मुसलमान जो कार्य तलवार और बन्दूक के बल से १२०० वर्ष में नहीं कर पाए, वो आज से १७५ वर्ष पहले भारत में अपनाई गयी लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा नीति ने लगभग पूर्ण कर दिया है. आज बचे खुचे भारत में नाम के ब्राह्मण और हिन्दू तो मिल जाते हैं लेकिन उनकी जीवन शैली पूर्ण रूप से इसाईओं वाली हो चुकी है.
महात्मा गांधी जी ने कहा था -
हिन्दू धर्म से मैं पूर्ण रूप से संतुष्टि पाता हूँ. यदि हिन्दू धर्म को जीवित रखना है तो ब्राह्मनातव को बचाना आवश्यक है.


आज मायावती और मुलायम सिंह जैसे लोग जब ये सोच कर प्रसन्न होते हैं कि वो ब्राह्मणों की निंदा कर के नया कार्य कर रहे हैं तो वे कहीं पीछे हैं. 
हमारी इतिहास की पुस्तकें ये सत्य कभी नहीं बताती क्योंकि यदि ब्राह्मणों को प्रतिष्ठा मिलेगी तो मार्क्सवाद, इस्लाम और अन्य राष्ट्रविरोधी शक्तियां विघटित हो जायेंगी. 

 

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

हँसना मना है

इस्लाम में फतवा शब्द का एक विशेष महत्त्व है. साधारण व्यक्ति समझते हैं कि फतवा केवल किसी व्यक्ति विशेष की हत्या करने के लिए दिए जाने वाले आदेश को कहते हैं. लेकिन ये सत्य नहीं है.

फतवा किसे कहते हैं?
एक प्रमुख इस्लामी साईट के अनुसार - फतवा एक इस्लामी साम्प्रदायिक निर्णय अथवा इस्लाम की न्याय व्यवस्था के संबंध में किसी विद्वान् की मान्यता है. फतवा इस्लाम के किसी मान्य अधिकारी द्वारा ही निर्गत किया जा सकता है किन्तु क्योंकि इस्लाम में मौलवियों का कोई वरीयता क्रम नहीं होता इसलिए फतवे को मानने की कोई बाध्यता नहीं होती. जो फतवा निर्गत करता है, उसे ज्ञानवान होना आवश्यक है और वो फतवा अपनी सूझ बूझ से ही देते हैं. उन्हें इस्लामी स्त्रोतों से फतवे के पक्ष में प्रमाण देने होते हैं. ऐसा भी होता है कि एक ही विषय पर विद्वानों की सहमति न हो. 

इस परिभाषा को पढने के पश्चात हिन्दू संस्कृति में पला बढ़ा व्यक्ति सोचेगा कि अधिकतर विषय आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, क्रोध, साधना, यम नियम, ध्यान, समाधि, सृष्टि चक्र, कुण्डलिनी शक्ति, पुनर्जन्म, योग, प्राणायाम इत्यादि से सम्बद्ध होंगे. अर्थात अधिकतर प्रश्न अपने स्वभाव और अन्तः करण से सम्बंधित होंगे. इस्लाम का दर्शन इस सब से थोड़ा भिन्न है. इस लेख में केवल थोड़े से फतवे दिए गए हैं. आइए देखें कि मुसलामानों की समस्यायों को फतवे कैसे हल करते हैं.

प्रश्न - उस बकरी के संबंध में क्या हुक्म है, जो गर्भवती है और जिस से इमरान (काल्पनिक नाम ) ने सम्भोग किया है?
फतवा -
ईमानवाले का फ़र्ज़ है कि वो तौबा कर ले. जानवर को मार कर जला दो और उस का मांस नहीं खाना है.
यदि आप को संशय है कि यहाँ जानवर कौन है तो उत्तर में बकरी को जानवर कहा गया है.

प्रश्न - यदि किसी पशु के साथ इमरान ने सम्भोग किया गया है तो उस के मांस और दूध के संबंध में क्या हुक्म है?
फतवा  -
यदि वीर्यपात पशु के अन्दर नहीं हुआ है तो उसका मांस और दूध बिना शक के हलाल है. लेकिन यदि वीर्यपात हुआ है तो उसे मार कर जला दो. हालांकि उसका मांस हराम नहीं है.

रोज़े के संबंध में जब जानवर के साथ किये सम्भोग पर प्रश्न किया गया तो उस के संबंध में जो फतवा है वो इस प्रकार है:
यदि वीर्यपात हुआ है तो स्नान भी करना पड़ेगा और प्रायश्चित भी करना पड़ेगा. लेकिन यदि वीर्यपात बिना गुप्तांग का इस्तेमाल किये और सिर्फ हाथों के इस्तेमाल से या जानवर को चूमने से हुआ है तो रोज़ा भंग नहीं होगा लेकिन स्नान करना पड़ेगा.
द वर्ल्ड ऑफ फतवास - अरुण शोरी पृष्ठ संख्या ७६ और ११४

यदि किसी की काफिर बुद्धि ये सोच रही है कि ये उत्तर किसी आलिम ने अपनी इच्छा से दे दिए हैं तो ये आप की भूल है और आप की नीच और काफिर बुद्धि का प्रमाण है. उल्लेमा इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तर शम्मी और दार उल मुख्तार जैसी मान्य किताबों के अनुसार देते हैं. मौलाना और इमाम इन प्रश्नों को न केवल उत्तर देने योग्य समझते हैं बल्कि इन के उत्तर देने  के लिए पुस्तकों को देखने का कष्ट करते हैं और उत्तर देना अपना बौधिक दायित्व समझते हैं. 

कुछ और दार्शनिक प्रश्न और उनके फतवे देखते हैं. ध्यान रहे कि उत्तर देने वाले कई वर्षों तक मदरसों में पढने के पश्चात ही इस योग्य समझे जाते हैं कि वो इमाम बन सकें.
एक मुसलमान के एक किरायेदार ने आपत्ति उठाई कि शौचालय में जो नित्य कर्म करने के लिए व्यवस्था है, उस के अनुसार, जब बैठते हैं तो इमानवालों की पीठ किबला (काबा) की ओर हो जाती है. ये कानून के खिलाफ है. रहम कर के रास्ता बताएं. अल्लाह आप पर रहमत करे.
विद्वान् इमाम साहिब जिन का नाम है मौलाना मुफ्ती हफीज कारी कानून के मुताबिक समाधान देते हैं:-
हज़रत मोहम्मद साहब (सही बुखारी और सही मुस्लिम) के अनुसार: शौच और मूत्र विसर्जन के समय न तो मुंह और न पीठ किबला की ओर होनी चाहिए. इसलिए इस्लाम के विद्वान् कानून के जानकारों ने इसे मकरुहे तहरिमी (न करने लायक) करार दिया है, ये किसी भवन के अन्दर हो अथवा बाहर (नुरल इज़ह पृष्ठ ३०, शम्मी खंड १, पृष्ठ 316 ). इसलिए जब तक व्यवस्था उचित दिशा में नहीं हो जाती, मोम्मिन को चाहिए कि वो थोड़ा सा टेढ़ा हो कर बैठे.
ऐसी ही समस्या एक और मोम्मिन की थी, जिस का प्रश्न था कि उल्लेमा के कहने के बावजूद भी लोग एक मस्जिद के पेशाबगाह की व्यवस्था, जो कि गलत दिशा मीन थी, को सही दिशा नहीं दे रहे थे. इस से सम्बद्ध जो गंभीर प्रश्न था वो था कि क्या उन इमामों की इमामत सही है जो इन शौचालयों का उपयोग करते हैं.
मौलाना अहमद रिज़ा खान का फतवा जो फतवा ऐ रिजविया (खंड २, पृष्ठ १५४) में अंकित है:
पेशाब करते वक़्त, न तो मुंह और न पीठ किबला की ओर होनी चाहिए. जो ऐसा करते हैं वो गलती कर रहे हैं. मस्जिद के व्यवस्थापकों को अथवा इलाके के बाशिंदों को चाहिए कि दिशा ठीक करें. और जब तक ऐसा इंतज़ाम नहीं हो जाता, उन का फ़र्ज़ है कि वो थोड़ा टेढ़ा हो कर बैठें. ऐसी संभावना है कि जिन्हें मालूम है, वो ऐसा ही कर रहे हैं (टेढ़े हो कर बैठ रहे हैं). जहां तक सवाल है इमामत का तो मुसलामानों पर कभी शक नहीं करना चाहिए. उन की इमामत सिर्फ इस वजह से गलत नहीं हो सकती.
 प्रश्न - यदि कोई मुसलमान आदमी एक गैर मुसलमान औरत से आर्य समाज के मंदिर में शादी करे और कोई इस शादी में शरीक हो तो उस के लिए क्या हुक्म है?
इस फतवे में जो शब्द मुशरिक है उसका अर्थ है एक से अधिक इश्वर मानने वाले और मूर्ती पूजा करने वाले.

फतवा -
एक गैर मुसलमान औरत से (काफिर या मुशरिक) हराम है और भारी गुनाह है. पवित्र कुरान के अनुसार: 'मुशरिका से निकाह न करो जब तक कि वो इस्लाम न कबूल करे - सुरा २, आयत २२१.' इस लिए ऐसे निकाह में शरीक होने की इजाज़त नहीं है. अगर कोई ये सोच कर निकाह करता है कि ये कानूनी है तो ये कुफ्र है. ऐसे आदमी के लिए ये फ़र्ज़ है कि वो जनता के सामने अपना दीन दोबारा अपनाए.
फतवा ए रहिमिय्या, खंड - २ पृष्ठ - ८६-८७

 कुरान की जिस आयत का यहाँ वर्णन आया है, वो पूरी आयत (अनुवाद - फारुक खान एवं नदवी) इस प्रकार है:-
और (मुसलमानों) तुम मुशरिक औरतों से जब तक ईमान न लाएँ निकाह न करो क्योंकि मुशरिका औरत तुम्हें अपने हुस्नो जमाल में कैसी ही अच्छी क्यों न मालूम हो मगर फिर भी ईमानदार औरत उस से ज़रुर अच्छी है और मुशरेकीन जब तक ईमान न लाएँ अपनी औरतें उन के निकाह में न दो और मुशरिक तुम्हे कैसा ही अच्छा क्यो न मालूम हो मगर फिर भी ईमानदार औरत उस से ज़रुर अच्छी है और मुशरेकीन जब तक ईमान न लाएँ अपनी औरतें उन के निकाह में न दो और मुशरिक तुम्हें क्या ही अच्छा क्यों न मालूम हो मगर फिर भी बन्दा मोमिन उनसे ज़रुर अच्छा है ये (मुशरिक मर्द या औरत) लोगों को दोज़ख़ की तरफ बुलाते हैं और ख़ुदा अपनी इनायत से बेहिश्त और बख़्शिस की तरफ बुलाता है और अपने एहकाम लोगों से साफ साफ बयान करता है ताकि ये लोग चेते
मूल अरबी आयत इस प्रकार है:-
وَلَا تَنكِحُوا الْمُشْرِكَاتِ حَتَّىٰ يُؤْمِنَّ ۚ وَلَأَمَةٌ مُّؤْمِنَةٌ خَيْرٌ مِّن مُّشْرِكَةٍ وَلَوْ أَعْجَبَتْكُمْ ۗ وَلَا تُنكِحُوا الْمُشْرِكِينَ حَتَّىٰ يُؤْمِنُوا ۚ وَلَعَبْدٌ مُّؤْمِنٌ خَيْرٌ مِّن مُّشْرِكٍ وَلَوْ أَعْجَبَكُمْ ۗ أُولَـٰئِكَ يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ ۖ وَاللَّـهُ يَدْعُو إِلَى الْجَنَّةِ وَالْمَغْفِرَةِ بِإِذْنِهِ ۖ وَيُبَيِّنُ آيَاتِهِ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
प्रश्न - क्या अपनी बीवी की सौतेली वालिदा (माँ) से निकाह कर के दोनों को एक घर में रखा जा सकता है?
फतवा -
हाँ, निकाह किया जा सकता है और दोनों को एक ही घर में रखा जा सकता है.
फतवा ए रहिमिय्या, खंड - २ पृष्ठ - ८६-८७

प्रश्न - क्या किसी की बीवी अपने शौहर के लिए हराम हो जायेगी अगर वो उसकी बहन (अपनी साली) से व्यभिचार करता है?
फतवा -
इस मामले में बीवी हमेशा के लिए हराम नहीं हो जायेगी, लेकिन कुछ कानून के सलाहकारों का मानना है कि शौहर को अपनी बीवी से तब तक संबंध नहीं बनाने चाहिए जब तक कि साली को एक माहवारी नहीं आ जाती.
फतवा ए रहिमिय्या, खंड - २ पृष्ठ - ८६-८७

इन प्रश्नों से स्पष्ट हो जाता है कि मुसलमान कितने भोले हैं कि इस प्रकार के प्रश्नों के लिए भी निर्देश प्राप्त करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं. कुछ लोग इस भोलेपन को अंध विश्वास, मूर्खता, अनपढ़ता अथवा उल्लेमा द्वारा कौम का नियंत्रण कहते हैं. संभवतः ये तो अपना अपना दृष्टिकोण है. कुछ और प्रश्न देखते हैं.

प्रश्न - इस्तिंजा (शौच के उपरान्त अपने अंगों को साफ़ करना) के लिए क्या हुक्म है? क्या कागज़ का इस्तेमाल कर सकते हैं?
पाठकों को भ्रान्ति न हो इसलिए पहले इस्तिंजा के संबंध में इस्लाम के संस्थापक मोहम्मद का क्या मत है, उसके संबंध में बता दूं.
एक मुशरिक ने मज़ाक उड़ाते हुए हज़रत सलमान फ़ारसी से कहा: "तुम्हारा साथी (पैगम्बर मोहम्मद) तुम्हें शौच के तरीके भी सिखाता है?" वो हमें एक बाप की तरह मोहब्बत करता है. उसने हमें बताया है कि शौच के वक़्त किबला की ओर मुंह नहीं करना चाहिए, धोते वक़्त दायें हाथ का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और सफाई के लिए तीन से कम मिटटी के ढेलों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए; हमें तीन ढेलों का इस्तेमाल करना चाहिए और गोबर या हड्डियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
व्याख्याकार - मुस्लिम
यदि कुछ संशय रह गया है तो एक और वर्णन भी है:-
पैगम्बर ने अपने साथियों से कहा:"मैं तुम्हारे लिए वैसा ही हूँ जैसे बच्चों के लिए बाप होता है. मैं तुम्हें बताता हूँ कि शौच के वक़्त न तो किबला की तरफ मुंह करो और न ही पीठ. सफाई के लिए मिटटी के तीन ढेलों का इस्तेमाल करो, सूखे गोबर या हड्डियों का इस्तेमाल न करो और अपने दायें हाथ का इस्तेमाल न करो.
मिश्कत, पृष्ठ - ४२

फतवा -
हाँ, इस्तिंजा के लिए कागज़ का इस्तेमाल जायज़ है. इसके अलावा, किसी भी ठोस और सूखी चीज़ का इस्तेमाल जायज़ है. पत्थर, लकड़ी, कपडा और मिटटी का इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन हड्डियों से, गोबर से या किसी और जानवर के मल से करना गलत है.
फतवा अहल ए हदीस, खंड - १, पृष्ठ ४५ 
जैसा कि ऊपर फतवे की परिभाषा में कहा गया है कि इन में मतभेद हो सकता है, इस फतवे के संबंध में बरेलवी मत के मौलाना असहमत हैं. उन से भी इस्तिंजा के संबंध में प्रश्न पूछा गया था.
प्रश्न - क्या इस्तिंजा के लिए कागज़ का इस्तेमाल हो सकता है, खासतौर से जब कोई रेलगाड़ी में जा रहा हो.

फतवा -
कागज़ से इस्तिंजा घिनौना है और गलत है. ये ईसाईयों का तरीका है. कागज़ अगर कोरा भी है तो उसकी इज्ज़त करनी चाहिए और यदि उस पर कुछ लिखा है तो ज्यादा इज्ज़त बख्शनी चाहिए. और जहां तक रेलगाड़ी का सवाल है तो क्या गाड़ी में मिटटी का ढेला या कपड़े का टुकड़ा नहीं ले जा सकते.
फतवा ए रिज़्विया, खंड - २, पृष्ठ १५३

बात तो मौलाना साहिब की सही है, अपने ईमान के लिए और अल्लाह की प्रसन्नता के लिए रेलगाड़ी में मिटटी के ढेले ले जाना कोई पहाड़ तोड़ने जैसा तो नहीं है.

रविवार, 19 दिसंबर 2010

गोहत्या - हिन्दुओं को नीचा दिखाने का उपाय

३ अप्रैल, १९८६ 
मुजद्दिद अलफ सानी द्वितीय के अनुसार भारत में गाय की हत्या एक महान इस्लामी परंपरा है . ये उन की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने गोहत्या को एक महान इस्लामी परंपरा के रूप में वर्णित किया था. ये परंपरा अन्य स्थानों पर नहीं है. किन्तु भारत में निश्चित रूप से ये एक महान इस्लामी परंपरा है क्योंकि भारत में गाय को पूजा जाता है. यदि मुसलामानों ने गोहत्या को त्याग दिया तो संभव है कि आने वाली पीढियां भी गाय को पवित्र मानने लग जायेंगी.
ये शब्द हैं मौलाना अबुल हसन अली नदवी के. ये कोई पाकिस्तानी अथवा बंगलादेशी मौलाना नहीं था बल्कि स्वतंत्र भारत के लखनऊ में बने नदवातुल उल्लेमा  का प्रधान था. ये शब्द कहे गए थे जेद्दाह में और कहे गए थे भारत और पाकिस्तान के मुसलामानों से जो वहाँ हज पर गए थे. इस मौलाना को उन भारतीय प्रसार माध्यमों में, जिन्हें परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप में तंत्र संचालित करता है, वो समाचार पत्र हों अथवा टी.वी. एक उदारवादी मुसलमान के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है.
इस से दो बातें स्पष्ट होती हैं. पहली तो ये कि गोहत्या इस्लाम की अनिवार्यता नहीं है, ये केवल हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए है.

गोहत्या के पीछे छिपी जो सोच है उसका एक उदाहरण हमें तैमुर लंग द्वारा लिखी गई उसकी आत्मकथा मल्फुज़त - ऐ- तैमूरी से मिलता है;
मैंने चेनाब के किनारे एक खेत में अपना शिविर लगाया. मैं अपने जिन आमिरों को घात लगाने के लिए छोड़ गया था, उनके कुछ घुड़सवार मेरे पास आये और उन्होंने मुझे बताया कि जब मैं वहाँ नहीं था तो जम्मू का राजा कुछ अन्य घृणित काफिरों के साथ पहाड़ों से आया था. जब वो समतल क्षेत्र में पहुंचे तो आमिरों ने अपने घात के स्थानों से निकल कर उन पर आक्रमण किया और बहुत से काफिरों को मार दिया. उनमें से कुछ जो घायल और थके हुए थे, जंगलों में भाग गए. दौलत तैमुर तावाची, हुसैन मलिक कुचिन और अन्य, जो आमिर शेख नूरुद्दीन की तुमान में थे जम्मू के राजा और लगभग ५० राजपूत बंधकों को ले कर आ रहे हैं. मैंने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया कि मोहम्मदी सम्प्रदाय के शत्रु या तो ईमान वालों के द्वारा काट दिए गए हैं अथवा बंदी बना लिए गए हैं. अभी कल वो अपनी संख्या के बल पर और जंगलों की सघनता के विश्वास से विद्रोह कर रहे थे, और ab, अल्लाह के रहम से, वो मेरे बंदी हैं. मैं उन ५० बंधकों को बेड़ियों और हथकड़ियों में बाँधने का आदेश दिया. जब मेरी दृष्टि जम्मू के राजा पर पड़ी जो कि घायल था, उस के ह्रदय को भय ने घेर लिया और वो जीवन दान के लिए धन देने को और मुसलमान बनाने के लिए तत्पर हो गया. मैंने उसी क्षण उसे मुसलमान बनाने का आदेश दिया. उसने कालिमा पढ़ा और मुसलमान बन गया. इन काफिरों में गोमांस खाने से बड़ा कोई अपराध और पाप नहीं माना जाता,लेकिन उसे मुसलामानों के साथ गोमांस खिलाया गया. इस प्रकार जब वो इस्लाम में शामिल किया गया तो मैंने अपने चिकित्सक से उसके घावों की चिकित्सा करने के लिए कहा. इसके पश्चात मैंने उसे शाही पोशाक और भेंट से सम्मानित किया.
यदि आपको इसपर आश्चर्य हो रहा है कि इतनी महत्तवपूर्ण और वहशी घटना के विषय में अधिकतर भारतीयों को जानकारी क्यों नहीं है तो इसका कारण है कि नेहरु अपनी पुस्तकों के माध्यम से इस्लामी आक्रान्ताओं के घिनौने चेहरे को छिपाने के प्रयत्न स्वतंत्रता से पहले ही करने लग गया था. इसका एक उदाहरण दिया गया है - नेहरु एक अन्तर्यामी में. स्वतंत्रता के उपरान्त तो इसने सभी पाठ्यपुस्तकों का नियंत्रण मार्क्सवादी अथवा मुसलामानों के हाथों में दिए रखा. ज्ञात हो कि ये दोनों विचारधाराएँ हर उस वस्तु से घृणा करती हैं जो भारतीयता अथवा हिन्दू धर्म का प्रतीक है.

भारत के इतिहास में मुसलामानों द्वारा गोहत्या के द्वारा हिन्दुओं को नीचा दिखाने का क्रम मोहम्मद बिन क़ासिम ने सन ७१२ में आरम्भ कर दिया था. इस का उल्लेख प्रसिद्द लेखक अल - बिरूनी ने किया है.
अल - बिरूनी लिखता है:
मुल्तान में सूर्य को समर्पित एक प्रसिद्द मूर्ती थी, जिसे आदित्य कहते थे. ये लकड़ी से बनी थी और इसकी आँखों के स्थान पर दो लाल माणिक जड़े थे. जब मोहम्मद बिन क़ासिम ने मुल्तान को जीत लिया तो उसने नगर के वैभव का कारण पता लगाने और इतने सारे कोष एकत्रित होने का कारण जानने के प्रयास किया तो उसे पता लगा कि इसका कारण यही प्रसिद्द मूर्ती है. यात्री सभी दिश्साओं से इसे एक तीर्थ मान कर आते हैं. आय के इस स्त्रोत को बचाए रखने के लिए उसने मूर्ती को तोड़ना उचित नहीं जाना और उसे वहीं रहने दिया. किन्तु उसका उपहास करने के लिए उसके गले में गाय का मांस लटका दिया. उसी स्थान पर उस ने एक मस्जिद बना दी. जब जालम बिन शिबन और उस के कमातियों ने मुल्तान को जीत लिया तो उन्होंने मूर्ती तोड़ दी और ब्राह्मणों की हत्या कर दी.
 ये नीच कर्म मुसलामानों द्वारा गत १३०० वर्षों से चला आ रहा है. यहाँ तक कि अकबर, जो कि सब से उदार मुसलमान शासक रहा है, के राज्य में भी ये क्रम टूट नहीं पाया था. उसके काल में लिखी गयी तबाक़त - ऐ -  अकबरी में हिमाचल प्रदेश के नगरकोट के दुर्ग के विषय में निज़ामुद्दीन अहमद लिखता है:-

भीम का दुर्ग (हिसार) जो कि महामाई का मंदिर है और जिस में एक मूर्ती स्थापित है, आक्रान्ताओं के पराक्रम से पहले ही आक्रमण में जीत लिया गया. राजपूतों का एक समूह, जिन्होंने निर्णय कर लिया था कि वो मरने को तत्पर हैं,  हताश हो कर लड़ते रहे, जब तक कि सब काट नहीं डाले गए. भारी संख्या में ब्राह्मण, जो मंदिर में कई वर्षों से सेवा करते आ रहे थे मार डाले गए. इन ब्राह्मणों ने वहाँ से भाग कर बचने के विषय में सोचा तक नहीं और मारे गए. हिन्दुओं की लगभग २०० गायें, मंदिर में आश्रय लेने के लिए एकत्रित हो गयीं. कुछ वहशी तुरुष्कों ने इन गायों को एक एक कर के मार दिया. इसके पश्चात उन्होंने अपने जूतों में गायों का रक्त भर कर उन्हें मंदिर की दीवारों और छत पर फेंका.

नगरकोट इस प्रकार का अपमान फ़िरोज़ शाह तुगलक के काल में भी झेल चुका था. इसका वर्णन इतिहासकार फ़रिश्ता अपने लेख में इस प्रकार करता है:
राजा नगरकोट के पर्वतों की ओर बढ़ा, जहां उसे ओलावृष्टि और हिमपात का सामना करना पड़ा. नगरकोट के राजा ने कुछ हानि सहन करने के पश्चात फ़िरोज़ शाह के समक्ष समर्पण कर दिया. इस पर नगर का नाम नगरकोट से मोहम्मदाबाद कर दिया गया.... कुछ इतिहासकारों का मत है कि फ़िरोज़ ने नगरकोट की मूर्तियाँ तोड़ी थीं. उनके टुकड़ों को गोमांस में मिला कर पोटलियों में भर दिया. ये पोटलियाँ ब्राह्मणों के गलों से बाँध कर उन्हें शिविर में चलाया  गया. वहाँ की मुख्य मूर्ती को मक्का के लिए रवाना कर दिया ताकि उसे वहाँ जाने वाली सड़क पर फेंक दिया जाए जिस से कि हज यात्री उस पर पाँव रख कर जाएँ. इसके साथ उसने मक्का के मौलवियों और हज यात्रियों को देने के लिए १००,००० टंके भी भेजे.
 
औरंगज़ेब की अखबारात में भी यही मानसिकता दिखलाई पड़ती है:
शहंशाह ने मोहम्मद खलील और खिदमत राय, जो कि कुल्हाड़ी चलाने वालों के दरोगा थे, को बुलाया, उन्हें शिविर का मंदिर तोड़ने को कहा और आदेश दिया कि मंदिर में गायें काटी जाएँ. ऐसा ही किया गया.
सन १७६२ में, अर्थात मोहम्मद बिन क़ासिम के मुल्तान आक्रमण के १०५० वर्ष उपरान्त, वो क्षेत्र जहां भारतीय संस्कृति के दो प्रमुख केंद्र गांधार और कम्बोज थे, हिन्दुओं को मार कर अथवा मुसलमान बना कर अफगानिस्तान बन चुका था. यहाँ अहमद शाह अब्दाली नामक फ़ारसी ने अपना राज्य बना लिया था जिसका केंद्र गांधार (वर्तमान कंधार) था. इसने पंजाब पर सात आक्रमण किये और इनमें से एक में उसने हरमंदिर साहिब को ध्वस्त कर दिया और उसका मलबा पवित्र सरोवर में गिरा दिया. फिर परिसर में गायों की हत्या कर के उसे अपवित्र कर दिया.

वर्तमान में, जब कि हमें  लगता है कि लोकतंत्र स्थापित है और सम्पूर्ण विश्व सभ्य हो रहे हैं, इस वहशी परंपरा के समर्थक पूरी निर्लज्जता से और निर्भीकता से इसे अपना अधिकार बताते हैं. कदाचित इन्हें लगता है कि ये आज भी सातवीं शताब्दी में ही जी रहे हैं.




अंग्रेज़ों की फूट डालो वाली नीति को भारतवर्ष के बंटवारे के पश्चात पूरे हिन्दू समाज पर एक सोचे समझे षड्यंत्र के अंतर्गत आरोपित कर दिया गया है. इसका परिणाम है कि आज पूरे समाज को छोटे छोटे समूहों में बाँट दिया गया है. प्रत्येक वर्ग को लालच दे कर अन्य श्रेणी में विभाजित कर दिया है. यदि समय रहते हिन्दू समाज नहीं जागा तो विघटनकारी शक्तियां भारत का अस्तित्व समाप्त कर देंगी. यदि संश्सय हो तो बंगाल, काश्मीर और केरल की भयावह स्थिति को देख लीजिये जहां आसुरी शक्तियां हावी हो गयी हैं.

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

इस्लाम में महिलाओं का सम्मान

इस्लाम के धारणा है कि कुरान में लिखा हर शब्द अल्लाह का आदेश है और प्रत्येक मुसलमान का कर्त्तव्य है कि इस का अक्षरशः पालन करे. यदि पत्नी पति की इच्छानुसार व्यवहार न करे तो इसके लिए भी मुस्लिम भाईओं के लिए कुरान में स्पष्ट निर्देश है. ये पुस्तक पति पत्नी के संबंध में क्या कहती है इस के लिए सुरा ४ की आयत ३४ इस प्रकार है:-
الرِّجَالُ قَوَّامُونَ عَلَى النِّسَاءِ بِمَا فَضَّلَ اللَّـهُ بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ وَبِمَا أَنفَقُوا مِنْ أَمْوَالِهِمْ ۚ فَالصَّالِحَاتُ قَانِتَاتٌ حَافِظَاتٌ لِّلْغَيْبِ بِمَا حَفِظَ اللَّـهُ ۚ وَاللَّاتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ وَاضْرِبُوهُنَّ ۖ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلَا تَبْغُوا عَلَيْهِنَّ سَبِيلًا ۗ إِنَّ اللَّـهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيرًا
इसका अनुवाद है:-
मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि (एक तो) ख़ुदा ने बाज़ आदमियों (मर्द) को बाज़ अदमियों (औरत) पर फ़ज़ीलत दी है और (इसके अलावा) चूंकि मर्दो ने औरतों पर अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं (और) उनके पीठ पीछे जिस तरह ख़ुदा ने हिफ़ाज़त की वह भी (हर चीज़ की) हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो मगर इतना कि खून न निकले और कोई अज़ो न (टूटे) पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाएं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूंढो ख़ुदा तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग़ है
इस आयत से प्रतीत होता है कि महिलाओं को पुरुषों से निम्न श्रेणी का माना जाता है. किन्तु क्या ये एक ही ऐसी आयत है? अथवा कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने त्रुटिपूर्ण अनुवाद कर दिया है?

यदि किसी सम्प्रदाय की मान्यताओं को समझना हो तो उस के संस्थापक से ही आरम्भ करना चाहिए. इसलिए इस्लाम की मान्यताओं के लिए मोहम्मद के जीवन का अध्ययन करते हैं. कुरान में मोहम्मद के लिए कुछ विशेषाधिकार दिए हैं जो कि साधारण मुसलामानों के लिए वैध नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि इस्लामी विश्वास के अनुसार जिब्रिल नामक एक देवदूत केवल मोहम्मद को ही दिखाई और सुनाई देता था, जो मोहम्मद को अल्लाह का आदेश सुनाता था और मोहम्मद उसे जनसाधारण को सुनाता था. इस प्रकार कुरान का जन्म हुआ. सभी मुसलमान इसे सबसे पवित्र पुस्तक मानते हैं. इसमें मोहम्मद के लिए सुरा (अध्याय) ३३ की आयत ५० में लिखा है:-
يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ إِنَّا أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَاجَكَ اللَّاتِي آتَيْتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ مِمَّا أَفَاءَ اللَّـهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّاتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَالَاتِكَ اللَّاتِي هَاجَرْنَ مَعَكَ وَامْرَأَةً مُّؤْمِنَةً إِن وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ إِنْ أَرَادَ النَّبِيُّ أَن يَسْتَنكِحَهَا خَالِصَةً لَّكَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۗ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ فِي أَزْوَاجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌ ۗ وَكَانَ اللَّـهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
इसका हिंदी अनुवाद है:-
ऐ नबी हमने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी उन बीवियों को हलाल कर दिया है जिनको तुम मेहर दे चुके हो और तुम्हारी उन लौंडियों को (भी) जो खुदा ने तुमको (बग़ैर लड़े-भिड़े) माले ग़नीमत में अता की है और तुम्हारे चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामू की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जो तुम्हारे साथ हिजरत करके आयी हैं (हलाल कर दी और हर ईमानवाली औरत (भी हलाल कर दी) अगर वह अपने को (बग़ैर मेहर) नबी को दे दें और नबी भी उससे निकाह करना चाहते हों मगर (ऐ रसूल) ये हुक्म सिर्फ तुम्हारे वास्ते ख़ास है और मोमिनीन के लिए नहीं और हमने जो कुछ (मेहर या क़ीमत) आम मोमिनीन पर उनकी बीवियों और उनकी लौंडियों के बारे में मुक़र्रर कर दिया है हम खूब जानते हैं और (तुम्हारी रिआयत इसलिए है) ताकि तुमको (बीवियों की तरफ से) कोई दिक्क़त न हो और खुदा तो बड़ा बख़शने वाला मेहरबान है
 इस में रेखांकित वाक्य में दो शब्दों पर ध्यान दीजिये, लौंडियाँ और ग़नीमत. इन में से प्रथम शब्द का अर्थ समझने में यदि कोई भूल हो तो इसका अर्थ है वो महिलाएं जिन्हें लूट कर लाया गया है. ग़नीमत का अर्थ है लूट का माल. इसके लिए एक और शब्द भी है कुरान में, ये है अन्फाल. अन्फाल का महत्त्व इसी से समझा जा सकता है कि इस पर कुरान में एक पूरा अध्याय (सुरा) दी गयी है, जिस में ७५ आयतें हैं और जिस का नाम है अल अन्फाल.  इस में लूट के माल से सम्बंधित कई निर्देश दिए गए हैं. कुरान के आठवें अध्याय अल अन्फाल  पहली आयत इस प्रकार है:-
يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنفَالِ ۖ قُلِ الْأَنفَالُ لِلَّـهِ وَالرَّسُولِ ۖ فَاتَّقُوا اللَّـهَ وَأَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْ ۖ وَأَطِيعُوا اللَّـهَ وَرَسُولَهُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
इस का अनुवाद इस प्रकार है:-
वे तुमसे ग़नीमतों के विषय में पूछते है। कहो, "ग़नीमतें अल्लाह और रसूल की है। अतः अल्लाह का डर रखों और आपस के सम्बन्धों को ठीक रखो। और, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, यदि तुम ईमानवाले हो
एक अन्य अनुवाद इस प्रकार है:-
(ऐ रसूल) तुम से लोग अनफाल (माले ग़नीमत) के बारे में पूछा करते हैं तुम कह दो कि अनफाल मख़सूस ख़ुदा और रसूल के वास्ते है तो ख़ुदा से डरो (और) अपने बाहमी (आपसी) मामलात की इसलाह करो और अगर तुम सच्चे (ईमानदार) हो तो ख़ुदा की और उसके रसूल की इताअत करो
 इन का अर्थ है कि अल्लाह ने लूट के माल को वैध ठहराया है. यहाँ उल्लेखनीय है कि मुसलामानों के अनुसार युद्ध के पश्चात, शत्रु की महिलाएं और बच्चे भी अन्फाल ही माने जाते हैं. ये युद्ध जिहाद कहा जाता है और जो मुसलमान नहीं हैं, वे सब काफिर हैं. काफिरों की महिलाओं के संबंध में कुरान में निर्देश हैं. सुरा ४, आयत २३-२४ है:-
حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَاتُكُمْ وَبَنَاتُكُمْ وَأَخَوَاتُكُمْ وَعَمَّاتُكُمْ وَخَالَاتُكُمْ وَبَنَاتُ الْأَخِ وَبَنَاتُ الْأُخْتِ وَأُمَّهَاتُكُمُ اللَّاتِي أَرْضَعْنَكُمْ وَأَخَوَاتُكُم مِّنَ الرَّضَاعَةِ وَأُمَّهَاتُ نِسَائِكُمْ وَرَبَائِبُكُمُ اللَّاتِي فِي حُجُورِكُم مِّن نِّسَائِكُمُ اللَّاتِي دَخَلْتُم بِهِنَّ فَإِن لَّمْ تَكُونُوا دَخَلْتُم بِهِنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ وَحَلَائِلُ أَبْنَائِكُمُ الَّذِينَ مِنْ أَصْلَابِكُمْ وَأَن تَجْمَعُوا بَيْنَ الْأُخْتَيْنِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ ۗ إِنَّ اللَّـهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا 
وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۖ كِتَابَ اللَّـهِ عَلَيْكُمْ ۚ وَأُحِلَّ لَكُم مَّا وَرَاءَ ذَٰلِكُمْ أَن تَبْتَغُوا بِأَمْوَالِكُم مُّحْصِنِينَ غَيْرَ مُسَافِحِينَ ۚ فَمَا اسْتَمْتَعْتُم بِهِ مِنْهُنَّ فَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةً ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا تَرَاضَيْتُم بِهِ مِن بَعْدِ الْفَرِيضَةِ ۚ إِنَّ اللَّـهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًا
इन का हिंदी अनुवाद है:-
तुम्हारे लिए हराम है तुम्हारी माएँ, बेटियाँ, बहनें, फूफियाँ, मौसियाँ, भतीतियाँ, भाँजिया, और तुम्हारी वे माएँ जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया हो और दूध के रिश्ते से तुम्हारी बहनें और तुम्हारी सासें और तुम्हारी पत्ऩियों की बेटियाँ जिनसे तुम सम्भोग कर चुक हो। परन्तु यदि सम्भोग नहीं किया है तो इसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं - और तुम्हारे उन बेटों की पत्ऩियाँ जो तुमसे पैदा हों और यह भी कि तुम दो बहनों को इकट्ठा करो; जो पहले जो हो चुका सो हो चुका। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है - और शौहरदार औरतें मगर वह औरतें जो (जिहाद में कुफ्फ़ार से) तुम्हारे कब्ज़े में आ जाएं हराम नहीं (ये) ख़ुदा का तहरीरी हुक्म (है जो) तुमपर (फ़र्ज़ किया गया) है और उन औरतों के सिवा (और औरतें) तुम्हारे लिए जायज़ हैं बशर्ते कि बदकारी व ज़िना नहीं बल्कि तुम इफ्फ़त या पाकदामिनी की ग़रज़ से अपने माल (व मेहर) के बदले (निकाह करना) चाहो हॉ जिन औरतों से तुमने मुताअ किया हो तो उन्हें जो मेहर मुअय्यन किया है दे दो और मेहर के मुक़र्रर होने के बाद अगर आपस में (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमें तुमपर कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और मसलेहतों का पहचानने वाला है
यहाँ जो शब्द कुफ्फार है, वो काफिर का बहुवचन है. इस आयत के विवरण की आवश्यकता नहीं है. इस का एक उदाहरण १९२१ में केरल में हुए मोपला दंगों में हिन्दू महिलाओं को देखने को मिला था. इसकी एक झलक हमें वहाँ की महिलाओं द्वारा उस समय के वाइसराय रीडिंग की पत्नी को लिखे याचना पत्र में मिलती है.
मोहम्मद ने अपने जीवन काल में इसी प्रकार दो महिलाओं सफिय्या और सय्यिदा जुवैरिय्या को अपनी पत्नी बनाया था और एक महिला रेहाना को अपनी उपस्री (कुरान की भाषा में लौंडी) बनाया था.
क्या लूट के माल को अपनाने में किसी प्रकार की आत्म ग्लानी अथवा लज्जा की भावना का कोई स्थान है? इस के लिए है सुरा ८ की आयत ६९:-
فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِّبًا ۚ وَاتَّقُوا اللَّـهَ ۚ إِنَّ اللَّـهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ 
 इसका हिंदी अनुवाद इस प्रकार है:-
अतः जो कुछ ग़नीमत का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
 अर्थात, अल्लाह ने लूट के माल को, जिसमें महिलाएं भी सम्मिलित हैं,  मुसलामानों के लिए पवित्र घोषित कर दिया है.
कुरान की वो आयत जो मुसलामानों को चार निकाह करने की अनुमति देती है, उसमें उपसृयों (लौंडियों) के संबंध में कोई सीमा नहीं है. ये है सुरा ४ की आयत ३:-
وَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تُقْسِطُوا فِي الْيَتَامَىٰ فَانكِحُوا مَا طَابَ لَكُم مِّنَ النِّسَاءِ مَثْنَىٰ وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تَعْدِلُوا فَوَاحِدَةً أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَلَّا تَعُولُوا
इसका हिंदी अनुवाद है:-
और यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम अनाथों (अनाथ लड़कियों) के प्रति न्याय न कर सकोगे तो उनमें से, जो तुम्हें पसन्द हों, दो-दो या तीन-तीन या चार-चार से विवाह कर लो। किन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार न कर सकोंगे, तो फिर एक ही पर बस करो, या उस स्त्री (लौंड़ी) पर जो तुम्हारे क़ब्ज़े में आई हो, उसी पर बस करो। इसमें तुम्हारे न्याय से न हटने की अधिक सम्भावना है
मोहम्मद के लिए अल्लाह मियाँ ने उपस्रियों के संबंध में स्पष्ट कह दिया है कि इनकी संख्या की कोई सीमा नहीं है. ये निर्देश है सुरा ३३ की आयत ५२ में:-
لَّا يَحِلُّ لَكَ النِّسَاءُ مِن بَعْدُ وَلَا أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَاجٍ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ اللَّـهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ رَّقِيبًا
इसका अनुवाद है:-
(ऐ रसूल) अब उन (नौ) के बाद (और) औरतें तुम्हारे वास्ते हलाल नहीं और न ये जायज़ है कि उनके बदले उनमें से किसी को छोड़कर और बीबियाँ कर लो अगर चे तुमको उनका हुस्न कैसा ही भला (क्यों न) मालूम हो मगर तुम्हारी लौंडियाँ (इस के बाद भी जायज़ हैं) और खुदा तो हर चीज़ का निगरॉ है
यदि उपस्रियों से रखे जाने वाले संबंध में कुछ संशय रह गया हो तो उसके लिए सुरा ७० में आयतें २९-३० इस प्रकार हैं:-
وَالَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَ
إِلَّا عَلَىٰ أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
हिंदी अनुवाद इस प्रकार है:-
और जो लोग अपनी शर्मगाहों को अपनी बीवियों और अपनी लौन्डियों के सिवा से हिफाज़त करते हैं
यहाँ अनुवादक द्वारा जो शब्द शर्मगाह का उपयोग किया गया है, उसे दूर अनुवादक स्पष्ट कर देता है:-
जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते है - अपनी पत्नि यों या जो उनकी मिल्क में हो उनके अतिरिक्त दूसरों से तो इस बात पर उनकी कोई भर्त्सना नही
अब यदि इस प्रकार से लौंडियाँ प्राप्त हो सकती हों तो संभावना है कि कोई ऐसे अथवा अन्य लूट के माल के लोभ से कुछ अधिक जोश में आ जाए. कुरान में इस के संबंध में भी दिशा निर्देश है. ये है सुरा ४ की आयत ९४:-
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا ضَرَبْتُمْ فِي سَبِيلِ اللَّـهِ فَتَبَيَّنُوا وَلَا تَقُولُوا لِمَنْ أَلْقَىٰ إِلَيْكُمُ السَّلَامَ لَسْتَ مُؤْمِنًا تَبْتَغُونَ عَرَضَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا فَعِندَ اللَّـهِ مَغَانِمُ كَثِيرَةٌ ۚ كَذَٰلِكَ كُنتُم مِّن قَبْلُ فَمَنَّ اللَّـهُ عَلَيْكُمْ فَتَبَيَّنُوا ۚ إِنَّ اللَّـهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا 
 इस का अनुवाद है:-
ऐ ईमानदारों जब तुम ख़ुदा की राह में (जेहाद करने को) सफ़र करो तो (किसी के क़त्ल करने में जल्दी न करो बल्कि) अच्छी तरह जॉच कर लिया करो और जो शख्स (इज़हारे इस्लाम की ग़रज़ से) तुम्हे सलाम करे तो तुम बे सोचे समझे न कह दिया करो कि तू ईमानदार नहीं है (इससे ज़ाहिर होता है) कि तुम (फ़क्त) दुनियावी आसाइश की तमन्ना रखते हो मगर इसी बहाने क़त्ल करके लूट लो और ये नहीं समझते कि (अगर यही है) तो ख़ुदा के यहॉ बहुत से ग़नीमतें हैं (मुसलमानों) पहले तुम ख़ुद भी तो ऐसे ही थे फिर ख़ुदा ने तुमपर एहसान किया (कि बेखटके मुसलमान हो गए) ग़रज़ ख़ूब छानबीन कर लिया करो बेशक ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है 
मोहम्मद की जीवन कथा लिखने वाले विल्लियम  मुइर के अनुसार, गनिमतें प्राप्त करने की उत्सुकता में मुसलामानों ने जब बहुत अधिक हत्याएं करनी आरम्भ कर दी, तो उन्हें रोकने के लिए ये आयत दी गयी थी.

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

मोहम्मद द्वारा तलाक़ की धमकी

मारिया

सन ६२८ में मोहम्मद ने मिस्र के राज्यपाल मौकोकास के पास अपना एक दूत भेजा, जिस का संदेश था कि मौकोकास, जो कि उस समय रोम के सम्राट का प्रतिनिधि था, इस्लाम स्वीकार करले क्योंकि मोहम्मद इस्लाम का पैगम्बर है.
मौकोकास ने गोल मोल सा उत्तर दे कर इनकार कर दिया. उसने उत्तर दिया; - 
मुझे ज्ञात है कि एक पैगम्बर आने वाला है किन्तु मेरे मत के अनुसार वो पैगम्बर सीरिया में प्रकट होगा. आप के दूत का भली भांति स्वागत किया गया है और मैं इस के साथ कुछ उपहार भेज रहा हूँ. इन में दो कौप्ट  (इसाई) बहनें हैं जिन्हें कौप्ट लोग पसंद करते हैं. एक पोशाक है और आपकी सवारी के लिए एक खच्चर है. 

मोहम्मद ने उपहार स्वीकार कर लिया.
दोनों गुलाम बहनें मोहम्मद की इच्छा के अनुरूप थीं. उन में से मारिया जो अधिक आकर्षक थी, मोहम्मद ने अपने लिए रख ली और दूसरी शिरीन, हस्सन नामक कवि को भेंट कर दी. सफ़ेद खच्चर जो अरब में विलक्षण था, मोहम्मद की सवारी के लिए उपयोग में लाया गया.
मोहम्मद की इस उपस्री मारिया से सम्बद्ध एक घटना है, जिस के संबंध में मोहम्मद की जीवन कथा लिखने वाले अधिकतर लेखक चुप्पी साध लेते हैं. यदि कुरान में इस के स्पष्ट प्रमाण नहीं होते तो मैं भी यही करता.

प्रत्येक पत्नी को एक एक दिन 
 
इस घटना को समझने के लिए एक बार पाठकों को बता दूं कि मोहम्मद का अपना कक्ष नहीं था अपितु वो अपनी प्रत्येक पत्नी के कक्ष में एक एक दिन व्यतीत करता था जिस से प्रत्येक पत्नी के साथ वो दिन व्यतीत कर सके.

हफ्सा की अचानक वापसी 
 
एक दिन उसे अपनी पत्नी हफ्सा के साथ व्यतीत करना था. उस दिन जब हफ्सा अपने पिता ओमर के यहाँ गयी हुई थी तो अचानक वापिस आ कर उस ने मोहम्मद को चौंका दिया. जब वो अपने कक्ष में पहुंची तो उस ने मोहम्मद को मारिया के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पाया. वो आग बबूला हो गयी और उसने अपने पति को प्रताड़ना दी. मारिया के एक उपस्री होने से हफ्सा को अधिक अपमान प्रतीत हुआ.

मोहम्मद का प्रण 
 
मोहम्मद ने हफ्सा का क्रोध शांत करने के लिए प्रण किया कि वो मारिया को त्याग देगा और हफ्सा से आग्रह किया कि इस घटना का उल्लेख और किसी से न करे. हफ्सा ने इसे नहीं माना और आयशा (मोहम्मद की एक और पत्नी) को इस संबंध में बता दिया. वो भी इस पर क्रोधित हो गयी. शीघ्र ही पूरे हरम में ये बात फ़ैल गयी और मोहम्मद को अपनी पत्नियों से उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ा.

कुरान की नई सुरा (अध्याय)
इस की प्रतिक्रिया के रूप में (जैसा कि ज़ैनब के संबंध में हुआ था) कुरान की नई आयतें मोहम्मद पर प्रकट हुईं. ये आयतें कुरान की सुरा (अध्याय) ६६ में अंकित हैं. इस सुरा में कुल १२ आयतें हैं. सुरा ६६, आयत १:-
يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّـهُ لَكَ ۖ تَبْتَغِي مَرْضَاتَ أَزْوَاجِكَ ۚ وَاللَّـهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
इस का अनुवाद इस प्रकार है:-
ऐ नबी! तुम अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए उस वस्तु से स्वयं को क्यों वंचित करते हो जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध ठहराई है? अल्लाह क्षमा करने वाला तथा दयालु है.
इसी का एक और अनुवाद है:-
 ऐ नबी! जिस चीज़ को अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध ठहराया है उसे तुम अपनी पत्नियों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए क्यो अवैध करते हो? अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
अर्थात अल्लाह ने मारिया से संबंध को वैध ठहराया है.

प्रण तोड़ने की आज्ञा 

किन्तु मोहम्मद तो प्रण ले चुका था कि मारिया को त्याग देगा. इस का समाधान भी अल्लाह ने अगली आयत से कर दिया. सुरा ६६, आयत २:-
قَدْ فَرَضَ اللَّـهُ لَكُمْ تَحِلَّةَ أَيْمَانِكُمْ ۚ وَاللَّـهُ مَوْلَاكُمْ ۖ وَهُوَ الْعَلِيمُ الْحَكِيمُ
इस का अनुवाद है:-
अल्लाह ने पहले ही तुम्हें अपनी सौगंध तोड़ देने का आदेश कर दिया है. अल्लाह महान है और सब कुछ जानने वाला समझदार है.
एक अन्य अनुवाद है:-
अल्लाह ने तुम लोगों के लिए तुम्हारी अपनी क़समों की पाबंदी से निकलने का उपाय निश्चित कर दिया है। अल्लाह तुम्हारा संरक्षक है और वही सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है

आयेशा को सूचना 

अगली आयत से ऐसा प्रतीत होता है कि हफ्सा ने इस घटना को गोपनीय रखना स्वीकार कर लिया था किन्तु फिर भी आयेशा को बता दिया. सुरा ६६, आयत ३:
وَإِذْ أَسَرَّ النَّبِيُّ إِلَىٰ بَعْضِ أَزْوَاجِهِ حَدِيثًا فَلَمَّا نَبَّأَتْ بِهِ وَأَظْهَرَهُ اللَّـهُ عَلَيْهِ عَرَّفَ بَعْضَهُ وَأَعْرَضَ عَن بَعْضٍ ۖ فَلَمَّا نَبَّأَهَا بِهِ قَالَتْ مَنْ أَنبَأَكَ هَـٰذَا ۖ قَالَ نَبَّأَنِيَ الْعَلِيمُ الْخَبِيرُ
हिंदी अनुवाद:-
और जब पैग़म्बर ने अपनी बाज़ बीवी (हफ़सा) से चुपके से कोई बात कही फिर जब उसने (बावजूद मुमानियत) उस बात की (आयशा को) ख़बर दे दी और ख़ुदा ने इस अम्र को रसूल पर ज़ाहिर कर दिया तो रसूल ने (आयशा को) बाज़ बात (किस्सा मारिया) जता दी और बाज़ बात (किस्साए यहद) टाल दी ग़रज़ जब रसूल ने इस वाक़िये (हफ़सा के आयशाए राज़) कि उस (आयशा) को ख़बर दी तो हैरत से बोल उठीं आपको इस बात (आयशाए राज़) की किसने ख़बर दी रसूल ने कहा मुझे बड़े वाक़िफ़कार ख़बरदार (ख़ुदा) ने बता दिया
 एक अन्य अनुवाद:-
 जब नबी ने अपनी पत्ऩियों में से किसी से एक गोपनीय बात कही, फिर जब उसने उसकी ख़बर कर दी और अल्लाह ने उसे उसपर ज़ाहिर कर दिया, तो उसने उसे किसी हद तक बता दिया और किसी हद तक टाल गया। फिर जब उसने उसकी उसे ख़बर की तो वह बोली, "आपको इसकी ख़बर किसने दी?" उसने कहा, "मुझे उसने ख़बर दी जो सब कुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है।"
 अर्थात उस की पत्नियां क्या वार्तालाप करती थीं, अल्लाह मोहम्मद को बता देता था.

मोहम्मद की शक्ति

अगली सुरा में मोहम्मद की स्थिति का उल्लेख है. सुरा ६६, आयत ४:-
إِن تَتُوبَا إِلَى اللَّـهِ فَقَدْ صَغَتْ قُلُوبُكُمَا ۖ وَإِن تَظَاهَرَا عَلَيْهِ فَإِنَّ اللَّـهَ هُوَ مَوْلَاهُ وَجِبْرِيلُ وَصَالِحُ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَالْمَلَائِكَةُ بَعْدَ ذَٰلِكَ ظَهِيرٌ
इसका हिंदी अनुवाद:
(तो ऐ हफ़सा व आयशा) अगर तुम दोनों (इस हरकत से) तौबा करो तो ख़ैर क्योंकि तुम दोनों के दिल टेढ़े हैं और अगर तुम दोनों रसूल की मुख़ालेफ़त में एक दूसरे की अयानत करती रहोगी तो कुछ परवा नहीं (क्यों कि) ख़ुदा और जिबरील और तमाम ईमानदारों में नेक शख़्श उनके मददगार हैं और उनके अलावा कुल फरिश्ते मददगार हैं
इसी का एक अन्य अनुवाद:
यदि तुम दोनों अल्लाह की ओर रुजू हो तो तुम्हारे दिल तो झुक ही चुके हैं, किन्तु यदि तुम उसके विरुद्ध एक-दूसरे की सहायता करोगी तो अल्लाह उसकी संरक्षक है, और जिबरील और नेक ईमानवाले भी, और इसके बाद फ़रिश्ते भी उसके सहायक है
इस्लाम के मान्यता के अनुसार, जिब्रिल नामक फ़रिश्ता (जो बाइबल में गैब्रील के नाम से वर्णित है), केवल मोहम्मद को दिखाई और सुनाई देता था. जिब्रिल ही मोहम्मद को अल्लाह की वाणी अर्थात कुरान सुनाता था और मोहम्मद वो संदेश लोगों को सुनाता था. इस आयत में इसी जिब्रिल का उल्लेख है. ये आयत मोहम्मद की पत्नियों को बताती है कि अल्लाह, फ़रिश्ते और मुसलमान मोहम्मद के साथ हैं.

तलाक़ का परिणाम 

अगली आयत हफ्सा और आयेशा को बताती है कि यदि मोहम्मद ने उन्हें तलाक़ दे दिया तो क्या होगा. सुरा ६६, आयत ५:-
عَسَىٰ رَبُّهُ إِن طَلَّقَكُنَّ أَن يُبْدِلَهُ أَزْوَاجًا خَيْرًا مِّنكُنَّ مُسْلِمَاتٍ مُّؤْمِنَاتٍ قَانِتَاتٍ تَائِبَاتٍ عَابِدَاتٍ سَائِحَاتٍ ثَيِّبَاتٍ وَأَبْكَارًا
हिंदी अनुवाद:
इसकी बहुत सम्भावना है कि यदि वह तुम्हें तलाक़ दे दे तो उसका रब तुम्हारे बदले में तुमसे अच्छी पत्ऩियाँ उसे प्रदान करे - मुस्लिम, ईमानवाली, आज्ञाकारिणी, तौबा करनेवाली, इबादत करनेवाली, (अल्लाह के मार्ग में) सफ़र करनेवाली, विवाहिता और कुँवारियाँ भी
 इसी आयत का एक और अनुवाद इस प्रकार है:
अगर रसूल तुम लोगों को तलाक़ दे दे तो अनक़रीब ही उनका परवरदिगार तुम्हारे बदले उनको तुमसे अच्छी बीवियाँ अता करे जो फ़रमाबरदार ईमानदार ख़ुदा रसूल की मुतीय (गुनाहों से) तौबा करने वालियाँ इबादत गुज़ार रोज़ा रखने वालियाँ ब्याही हुई और बिन ब्याही कुंवारियाँ हो
अर्थात अल्लाह मियां की रहमत से मोहम्मद को आज्ञाकारी और कुंवारी नयी पत्नियां मिल जायेंगी.

अगली चार आयतें काफिरों से जिहाद के लिए उकसाती हैं, यहाँ घटनाक्रम को निरंतर रखने के लिए उनका उल्लेख नहीं किया जा रहा है.

अवज्ञाकारी पत्नियों के लिए जहन्नुम की आग 

जो मोहम्मद की आज्ञा नहीं मानते वो काफिर हैं और यदि आज्ञा न मानी जाए तो क्या पत्नियों का क्या होगा इसका वर्णन हैं सुरा ६६, आयत १० में:-
ضَرَبَ اللَّـهُ مَثَلًا لِّلَّذِينَ كَفَرُوا امْرَأَتَ نُوحٍ وَامْرَأَتَ لُوطٍ ۖ كَانَتَا تَحْتَ عَبْدَيْنِ مِنْ عِبَادِنَا صَالِحَيْنِ فَخَانَتَاهُمَا فَلَمْ يُغْنِيَا عَنْهُمَا مِنَ اللَّـهِ شَيْئًا وَقِيلَ ادْخُلَا النَّارَ مَعَ الدَّاخِلِينَ
हिंदी अनुवाद:
ख़ुदा ने काफिरों (की इबरत) के वास्ते नूह की बीवी (वाएला) और लूत की बीवी (वाहेला) की मसल बयान की है कि ये दोनो हमारे बन्दों के तसर्रुफ़ थीं तो दोनों ने अपने शौहरों से दगा की तो उनके शौहर ख़ुदा के मुक़ाबले में उनके कुछ भी काम न आए और उनको हुक्म दिया गया कि और जाने वालों के साथ जहन्नुम में तुम दोनों भी दाखिल हो जाओ
 दूसरा अनुवाद:
अल्लाह ने इनकार करनेवालों के लिए नूह की स्त्री और लूत की स्त्री की मिसाल पेश की है। वे हमारे बन्दों में से दो नेक बन्दों के अधीन थीं। किन्तु उन दोनों स्त्रियों ने उनसे विश्वासघात किया तो अल्लाह के मुक़ाबले में उनके कुछ काम न आ सके और कह दिया गया, "प्रवेश करनेवालों के साथ दोनों आग में प्रविष्ट हो जाओ।" 
अर्थात अल्लाह ने उन पत्नियों के लिए जहन्नुम की आग रखी है जो पति का कहा नहीं मानती. उदाहरण के रूप में दो महिलाओं नूह और लूत का नाम है.  ये दोनों नेक पुरुषों की पत्नियाँ थीं किन्तु उस से विश्वासघात का कारण जहन्नुम की आग में डाल दी गयी थीं. उल्लेखनीय है कि ये दोनों पात्र भी बाइबल के नोआह (NOAH) और लौट (LOT) हैं.

मारिया के साथ एक पूरा माह 

इस घटना के पश्चात मोहम्मद अपनी पत्नियों के कक्ष छोड़ कर मारिया के साथ रहने चला गया क्योंकि अल्लाह ने उसे आज्ञा दे दी थी और उस के प्रण से भी मुक्त कर दिया था.


मोहम्मद द्वारा पत्नियों को क्षमादान

इस घटना की दोनों मुख्य पात्र, हफ्सा एवं आयेशा, मोहम्मद के निकटतम सहयोगी ओमर और अबू बकर की बेटियाँ थीं. ये दोनों मित्र इस घटनाक्रम से परेशान थे क्योंकि मोहम्मद ने उनकी बेटियों से एक उपस्री को अधिक महत्त्व दे दिया था. ये दोनों मोहम्मद के  पास मंत्रणा करने गए तो मोहम्मद ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया. उसके अनुसार जिब्रिल ने उसे हफ्सा की प्रशंसा की थी और अपनी पत्नियों के पास लौटने को कहा था. तत्पश्चात मारिया का निवास पत्नियों से भिन्न स्थान पर किया गया. मारिया ने मोहम्मद के एक बेटे इब्राहिम को जन्म दिया था जो अल्पायु में ही रोग से मर गया था.

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

जौहर एवं सती प्रथा

इस्लाम की मान्यता के अनुसार नबी मोहम्मद एक सम्पूर्ण पुरुष था और अल्लाह ने उसे सभी मुसलामानों के लिए एक आदर्श के रूप में भेजा है. इसका वर्णन कुरान में इस प्रकार है:-
لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّـهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّـهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّـهَ كَثِيرًا
निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है अर्थात उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अन्तिम दिन की आशा रखता हो और अल्लाह को अधिक याद करे 
Indeed in the Messenger of Allah (Muhammad SAW) you have a good example to follow for him who hopes in (the Meeting with) Allah and the Last Day and remembers Allah much.

इसलिए जिन्होंने पढ़ा हो कि मोहम्मद बालों में मेहंदी लगाता था, तो वो भी मेहँदी लगाते हैं. जिसे पता लगता है कि मोहम्मद मूंछ कटवाता था और दाढ़ी रखता था, वो भी वैसा ही करता है. इसका अर्थ है कि यदि मोहम्मद ने अपने  जीवन काल में कोई भी कार्य किया हो तो प्रत्येक मुसलमान उसे अक्षरशः पालन करने का प्रयत्न करता है क्योंकि ये उस के सम्प्रदाय की मांग है.
मोहम्मद ने अपने जीवन काल में जो महत्त्वपूर्ण कार्य किये थे, उनका संकलन मुसलामानों ने किया है. मोहम्मद के जीवन की इन घटनाओं के विवरण को हदीस कहा जाता है जिसका बहुवचन है अहादीस. इन संकलनों को कई पुस्तकों में संकलित किया गया है किन्तु इन में से छः ऐसी हैं जिन्हें सर्वमान्य कहा जाता है. इन में से भी दो: सही बुखारी और सही मुस्लिम, सर्वोच्च मानी जाती हैं. इन में वर्णित है कि मोहम्मद ने अपने जीवन काल में काफिरों का नरसंहार किया था, मूर्तियों को तोड़ा था, काफिरों को मारने के पश्चात उन की विधवाओं से निकाह किया था (जुवैरिय्या, सफिय्या), उन्हें अपनी उपस्री अर्थात रखैल (रेहाना) बनाया था और उन्हें गुलामी के लिए बेच कर धन कमाया था.
इसलिए जब मुसलामानों ने भारत में शासन स्थापित किया तो मोहम्मद और कुरान के अनुसार हिन्दुओं की महिलाओं से ऐसा ही व्यवहार किया.
भारतवर्ष में जो धर्म और संस्कृति चली आ रही है, उसके अनुसार अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री से संबंध बनाना एक निंदनीय कार्य माना जाता था, किन्तु मुसलामानों को काफिरों की महिलाओं से दुष्कर्म करना कुरान में मान्य किया गया है. सूरा ४ की आयत २४ इसे दर्शाती है:-
وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۖ كِتَابَ اللَّـهِ عَلَيْكُمْ ۚ وَأُحِلَّ لَكُم مَّا وَرَاءَ ذَٰلِكُمْ أَن تَبْتَغُوا بِأَمْوَالِكُم مُّحْصِنِينَ غَيْرَ مُسَافِحِينَ ۚ فَمَا اسْتَمْتَعْتُم بِهِ مِنْهُنَّ فَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةً ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا تَرَاضَيْتُم بِهِ مِن بَعْدِ الْفَرِيضَةِ ۚ إِنَّ اللَّـهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًا
इस का अनुवाद इस प्रकार है:
और शौहरदार औरतें मगर वह औरतें जो (जिहाद में कुफ्फ़ार से) तुम्हारे कब्ज़े में आ जाएं हराम नहीं (ये) ख़ुदा का तहरीरी हुक्म (है जो) तुमपर (फ़र्ज़ किया गया) है और उन औरतों के सिवा (और औरतें) तुम्हारे लिए जायज़ हैं बशर्ते कि बदकारी व ज़िना नहीं बल्कि तुम इफ्फ़त या पाकदामिनी की ग़रज़ से अपने माल (व मेहर) के बदले (निकाह करना) चाहो हॉ जिन औरतों से तुमने मुताअ किया हो तो उन्हें जो मेहर मुअय्यन किया है दे दो और मेहर के मुक़र्रर होने के बाद अगर आपस में (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमें तुमपर कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और मसलेहतों का पहचानने वाला है
And all married women (are forbidden unto you) save those (captives) whom your right hands possess. It is a decree of Allah for you. Lawful unto you are all beyond those mentioned, so that ye seek them with your wealth in honest wedlock, not debauchery. And those of whom ye seek content (by marrying them), give unto them their portions as a duty. And there is no sin for you in what ye do by mutual agreement after the duty (hath been done). Lo! Allah is ever Knower, Wise.
परिणाम स्वरुप, जब इस्लामी आक्रमणकारियों ने भारत में हमले किये और यहाँ शासन स्थापित किया तो हिन्दू महिलाओं के साथ भी हर प्रकार के घृणित व्यवहार किये गए. मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात, ६३२ से लेकर ७१२ तक जितने भी हमले भारतवर्ष पर किये गए, इस्लामिक आक्रमणकारी हिन्दू राजाओं के हाथों या तो परास्त हो गए अथवा मारे गए. इन वर्षों में महिलयों की इस्लामी आक्रान्ताओं द्वारा की जाने वाली दुर्दशा की सूचना हिन्दुओं तक पहुँच चुकी थी.
मुसलामानों के विपरीत, यहाँ के क्षत्रिय युद्ध भी नियमों की मर्यादा में करते थे और महिलाओं में उच्च कोटि के संस्कार थे. परिणामतः आरम्भ हुई एक ऐसी परंपरा जो आज सती के नाम से जानी जाती है.
इस का जो अधिक उपयुक्त शब्द है, वह है जौहर जो जीव हर की संधि से बना है और इस का अर्थ है जीवन को देना. जब ७१२ में सिंध में मोहम्मद बिन क़ासिम ने वहाँ के शासक दाहिर का रणभूमि में वध कर दिया था तो ये सूचना पा कर उसकी बहन बाई ने रावर दुर्ग में उपस्थित सभी महिलायों को संबोधित कर के कहा था:-
अब ये तय है कि हम इन चांडालों और गोमांस भक्षकों के चंगुल से नहीं बच सकतीं. हमारी सुरक्षा और स्वतंत्रता की कोई आशा नहीं है इसलिए हम लकड़ी, कपास और तेल एकत्रित कर के आत्मदाह कर लें ताकि हम अपने पतियों से (स्वर्ग में) शीघ्र ही मिल जाएँ. इस के लिए कोई बाध्य नहीं है. जो शत्रु से याचना करना चाहें वो इस के लिए स्वतंत्र हैं.
वो सब एक मत थीं और उन्होंने एक घर को आग लगा कर उसमे अपने आप को भस्म कर लिया. जो महिलाएं दुर्ग से बाहर थीं, वो इतनी भाग्यशाली नहीं रहीं. मोहम्मद क़ासिम अपने मुसलमान सैनिकों के साथ तीन दिन तक वहाँ रुका था, जिन में उसने ६,००० योद्धाओं का वध किया था और लगभग ६०,००० बंधक बनाए थे. इन सब महिलाओं और बच्चों को मुसलमान बना दिया गया था. इन में ३० युवतियां राजघराने की थीं. इन्हें इराक के शासक हज्जाज के पास भेज दिया गया. जब हज्जाज को ये बंधक मिले तो उन के साथ मोहम्मद बिन क़ासिम ने राजा दाहिर का कटा हुआ सर भी भेजा था. इस कटे सर को देख कर हज्जाज ने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया और नमाज़ अदा की. इन बंधकों में से २०% को उस समय के खलीफा वालिद को भेज दिया गया. खलीफा ने इन में से कुछ को बंदियों के रूप में बेच दिया और कुछ को भेंट स्वरुप मित्रों में बाँट दिया. 
प्रत्येक लूट के माल (जिसे ग़नीमत भी कहते हैं) में से २०%, वो धन हो अथवा महिलाएं, अल्लाह और मोहम्मद के लिए होती थीं. ये परंपरा भी इस्लाम के संस्थापक मोहम्मद ने आरम्भ की थी. मोहम्मद की मृत्यु (६३२) के पश्चात, जो भी खलीफा होता था, उसे अल्लाह का प्रतिनिधि मान कर २०% ग़नीमत उसे दी जाती थी. इस से सम्बंधित आयत है सुरा ८ की आयत ४१:-
وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُم مِّن شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّـهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ إِن كُنتُمْ آمَنتُم بِاللَّـهِ وَمَا أَنزَلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا يَوْمَ الْفُرْقَانِ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ ۗ وَاللَّـهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
इस का अनुवाद इस प्रकार है:
और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ ग़नीमत के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पाँचवा भाग अल्लाह का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफ़िरों का है। यदि तुम अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमने अपने बन्दे पर फ़ैसले के दिन उतारी, जिस दिन दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हूई, और अल्लाह को हर चीज़ की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त है
एक अन्य अनुवाद इस प्रकार है:-
और जान लो कि जो कुछ तुम (माल लड़कर) लूटो तो उनमें का पॉचवॉ हिस्सा मख़सूस ख़ुदा और रसूल और (रसूल के) क़राबतदारों और यतीमों और मिस्कीनों और परदेसियों का है अगर तुम ख़ुदा पर और उस (ग़ैबी इमदाद) पर ईमान ला चुके हो जो हमने ख़ास बन्दे (मोहम्मद) पर फ़ैसले के दिन (जंग बदर में) नाज़िल की थी जिस दिन (मुसलमानों और काफिरों की) दो जमाअतें बाहम गुथ गयी थी और ख़ुदा तो हर चीज़ पर क़ादिर है 
जब ये पांचवां भाग, खलीफा के पास पहुंचा तो इन बंधकों में राजा दाहिर की बहन की बेटी भी थी. जब खलीफा ने उसे देखा तो उस की सुन्दरता को देखता ही रह गया और विस्मय से अपनी अंगुलियाँ चबाने लगा. अब्दुल्लाह बिन अब्बास भी उसे देख कर ललचा रहा था. खलीफा ने कहा,
मेरे भतीजे, मुझे ये लड़की अत्यंत लुभावनी लग रही है और मैं इसे अपने लिए रखना चाहता हूँ. लेकिन यदि तुम चाहते हो तो तुम इसे ले जाओ और इस से अपने बच्चे पैदा करो. इस प्रकार खलीफा की आज्ञा से अब्दुल्लाह उसे ले गया और कई वर्षों तक उसे अपने पास रखा.
चाचनामा - (Elliot and Dowson - pp - 173)


इसके उपरान्त जहां भी हिन्दुओं को ये निश्चित हो जाता कि पराजय हो जायेगी, महिलाएं म्लेच्छों की बांदियाँ बनाने से मर जाना उपयुक्त समझती थीं. इस लेख में कुछ गिनी चुनी घटनाएं सम्मिलित की गयी हैं. इतिहास ऐसी, हिन्दू महिलाओं के रक्त से सनी घटनाओं से भरा पड़ा है, जिन्हें एक राष्ट्रीय षड़यंत्र के अंतर्गत या तो उजागर नहीं होने दिया जाता अथवा उन्हें तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है.


जब अकबर (जिस के हरम में ५,००० महिलाएं थीं) ने चित्तौढ़ पर आक्रमण किया था तो वहाँ भी लगभग ३०० महिलाओं ने जौहर किया था.  
अकबरनामा, खंड २, पृष्ठ ४४२

आज भारत और नेपाल तेराई क्षेत्र में जो थारु  कबीले के नाम से जाने जाते हैं, उस के पीछे भी परोक्ष रूप से जौहर का हाथ है. जब एक वृद्ध सिसोदिया राजपूत राजा को लगा कि मुसलामानों से युद्ध में पराजय लगभग निश्चित है तो उस ने वीरगति को प्राप्त होने का निर्णय कर लिया और युद्ध क्षेत्र न छोड़ने का निर्णय किया. किन्तु अपनी सुन्दर पुत्रियों को वो मुसलमानों के हाथों से बचाना चाहता था. उसने अपने कुछ विश्वसनीय क्षत्रियों और भील सैनिकों के साथ अपनी पुत्रियों को हिमालय में बसे अपने प्रियजनों के पास जाने के लिए रवाना कर दिया. दुर्भाग्य वश बीहड़ जंगलों में मलेरिया तथा अन्य व्याधियों से अधिकतर योद्धयों की मृत्यु हो गयी. जब अंतिम राजपूत मर गया तो इन राजकुमारियों ने अपने भील रक्षकों से कहा कि वे इन्हीं तेरे के वनों में भीलों से विवाह कर के बस जायेंगी. उन्होंने शर्त रखी कि उनके वंश में सदा महिलाएं ही प्रधान होंगी. वे भोजन तो पकाएँगी किन्तु परोसेंगी नहीं. आज भी परंपरा है कि महिलाएं भोजन थाल में रख कर पुरुषों की ओर पाँव से सरका देती हैं.

कभी कभी इन वीरांगनाओं का भाग्य इन का साथ नहीं देता था. सन १६३४ में जब शाहजहाँ की सेना बुंदेला विद्रोह को कुचल रही थी, तब जुझार सिंह बुंदेला के ओरछा क्षेत्र से मुसलामानों द्वारा कई महिलाओं को बंदी बना कर उनसे बड़ी बर्बरता से व्यवहार किया गया था. जुझार सिंह अपने चौरागढ़ के दुर्ग से बहुत सी महिलायों के साथ दक्षिण की ओर भाग निकला. जब उनके घोड़े बिदक गए तो जुझार सिंह ने उन महिलाओं को मार दिया और बची हुई महिलाओं को लेकर गोलकुंडा पहुंचा. अभी वहाँ महिलाएं जौहर पूरा नहीं कर पाई थीं जब मुसलमान पहुँच गए. कुछ ने अपने को तलवार और खंजर से घायल कर लिया था. मुग़ल इन घायल महिलाओं को भी उठा कर ले गए.
Cambridge history of India, Vol. 4, page 195

अमीर खुसरो, जिसे नेहरु से ले कर आज तक के सब बुद्धिजीवी, एक षड़यंत्र के अंतर्गत इस्लाम के उदार मुखौटे के रूप में प्रस्तुत करते हैं, हमें सन १३०१ में मुसलामानों द्वारा रणथम्बौर पर आक्रमण के संबंध में बताता है कि मुसलमान काफिरों के दुर्ग पर बड़े बड़े पत्थर फेंक रहे थे, जिस से कि हिन्दू भयभीत होने लगे थे. एक माह तक दुर्ग को मुसलामानों ने घेरे रखा. हिन्दुओं को भोजन की इतनी कमी हो गई कि अन्न का एक दाना, सोने के दो टुकड़ों के एवेज में मिलता था.
एक रात, राय (राजा) ने पर्वत के शिखर पर अग्नि जलाई और अपनी स्त्रियों तथा अपने प्रियजनों को उस में झोंक दिया और अपने कुछ स्वामिभक्त सेवकों के साथ मुसलामानों पर हमला कर दिया और मारा गया. इस खुशकिस्मती के दिन रणथम्बौर का सशक्त दुर्ग घृणित राय के संहार से जीत लिया गया.
Elliot and Dowson, Volume - 3, pp 72 - तारीख ऐ अल्लाई 

सुल्तान अबुल मुजाहिद मोहम्मद शाह के सैनिकों ने जब सुल्तान के भतीजे बहाउद्दीन को पकड़ने के लिए काम्पिल्य को घेर लिया (जो वहाँ के राजा की शरण में था) तोअफ्रीका से आया हुआ इब्न बतूता लिखता है:
 जब उस काफिर (हिन्दू राजा) ने अपने ऊपर आये संकट को भांप लिया. उसका अनाज का भण्डार लगभग रिक्त था और उसे भय था कि मुसलमान उसे बंधक बना लेंगे. उस ने बहाउद्दीन से कहा, "तुम स्थिति को देख ही रहे हो. मैंने अपने कुल के साथ मरने का निर्णय कर लिया है. तुम उस (हिन्दू राजा का नाम लेते हुए) राजा की शरण में चले जाओ, वो तुम्हारी सुरक्षा करेगा". उस ने किसी को उसे राह दिखाने के लिए भेज दिया. फिर उस ने अग्नि जलाई और अपनी पत्नी और पुत्रिओं से कहा,"मैं मरने जा रहा हूँ. तुम में से जो चाहें वो भी ऐसा कर सकते हैं". इसके पश्चात्, सभी महिलाओं ने स्नान किया, अपने शरीर पर चन्दन का लेप लगाया, भूमि को चूमा और अग्नि में कूद गयीं. वे सब मर गयीं. राजा के मंत्रिओं और मुखियाओं की महिलाओं ने भी यही किया. इस के उपरान्त राजा ने स्नान किया, चन्दन कअ लेप लगाया, अपने अस्त्र शस्त्र उठाए और कवच के बिना युद्ध के लिए चल पड़ा. उस के सभी सेवकों ने भी उस का अनुसरण किया. वे तब तक लड़ते रहे जब तक कि मर नहीं गए. नगर के निवासियों को बंधक बना लिया गया. राजा के ११ बेटे भी बंधक बना लिए गए. सुल्तान ने उन्हें मुसलमान बना दिया.
The travels of Ibn Batuta
इन मुसलमान शासकों का घिनौना रूप छिपाने के लिए एक कुतर्क दिया जाता है कि राजपूत अपने झूठे अहंकार के चलते सती अथवा जौहर जैसे कृत्य करते थे. इस का खंडन तारीख ऐ फ़िरोज़ शाही में मिल जाता है. इस का लेखक अब्बास खान लिखता है कि जब काफिर पूरण मल को पता लगा कि उस के पड़ाव को सुल्तान ने घेर लिया है तो वो अपनी प्रिय पत्नी रत्नावली के पास गया और उस का गला काट दिया. इसके पश्चात उसने अपने साथियों से भी ऐसा ही करने को कहा. उन्होंने अपनी महिलाओं का वध कर दिया. इतने में अफगानों ने हिन्दुओं को घेर लिया और चारों ओर से उन्हें मारना आरम्भ कर दिया. काफिरों ने खाड़ी के सूयरों की भांति वीरता दिखाई पर शीघ्र ही मार दिए गए. उनकी जो महिलाएं और प्रियजन बच गए थे, उन्हें बंदी बना लिया गया. इन में से पूरण मल की एक पुत्री और उस के भाई के तीन पुत्रों के अतिरिक्त सभी को मार दिया गया. बाद में पूरण मल की बेटी एक बाज़ीगर को दे दी गयी ताकि उसे बाजारों में नचाया जा सके. तीनों लड़कों को हिजड़ा बना दिया गया ताकि उस का कुल नष्ट हो जाए.


एक और कुतर्क जिस से इस्लामी शासकों की बर्बरता को कम कर के दर्शाने का प्रयत्न होता है वो है कि शत्रु को मारना तो युद्ध नीति के अंतर्गत है, इस में सम्प्रदाय को नहीं लाना चाहिए. यदि इन शासकों ने ये दुर्व्यवहार सम्प्रदाय को ध्यान में न रखते हुए किया हो तो इसे उचित माना जा सकता है. किन्तु वास्तविकता ये है कि ये शासक यहाँ शासन नहीं जिहाद करने आये थे और इसे पूरे गर्व से अपनी ही लेखनी से स्वीकार भी करते थे. इस कुतर्क का उत्तर भी मुसलमान इतिहासकारों की लेखनी से ही मिल जाता है.

प्रस्तुत घटना शाह जहां के शासन काल की है जब औरंगजेब ने कल्याणी पर आक्रमण किया था. मुग़ल सेना ने एक दुर्ग को घेर लिया था. उल्लेख इस प्रकार है:
घिरे हुए सैनिकों ने कड़ा संघर्ष किया और बानों और रॉकेटों की वर्षा कि. हथगोले, मिटटी तेल के गोले और जलती हुई वस्तुएं शाही सेना पर गिराई, लेकिन आक्रमणकारी वीरता से आगे बढ़ते रहे क्योंकि जीत निश्चित थी. इस अवसर पर, दिलावर हब्शी, जो इस दुर्ग की सुरक्षा आदिल खान की ओर से अपने २,५०० सैनिकों के साथ कर रहा था अपनी स्थिति को भांप गया. उसने क्षमा याचना के लिए एक पत्र भेज कर आत्म समर्पण का प्रस्ताव दिया. क्योंकि सभी सैनिक मुसलमान थे, सभी को अपनी संपत्ति, पत्निओं और प्रियजनों सहित जाने की अनुमति मिल गयी. राजकुमार औरंगज़ेब ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
कुछ ऐसा ही तैमुर लंग ने किया था. उसकी आत्मकथा मल्फुज़ती तैमूरी में लोनी  नामक दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त वो उल्लेख करता है:
बहुत से राजपूतों ने अपनी पत्नियों और बच्चों को अपने घरों में ले जाकर उन्हें जला दिया और इसके उपरान्त वो युद्ध क्षेत्र में डट गए और मारे गए. दुर्ग के अन्य सैनिकों  ने भी युद्ध किया, जिन में से कई मारे गए और कई बंधक बना लिए गए. अगली प्रातः मैंने आदेश दिया कि मुसलमान सैनिकों को क्षमा कर दिया जाए और काफिरों को तलवार से नरक में भेज दिया जाए. मैंने ये आदेश भी दिया कि आस पास के घरों में से सय्यिदों, शेखों और मुसलामानों के घरों को सुरक्षित रख के अन्य सभी घरों को लूट लिया जाए और दुर्ग को नष्ट कर दिया जाए. ऐसा ही किया गया और हमें बड़ी मात्र में लूट का माल मिला.
यहाँ दिए गए सभी उल्लेख मुसलमान इतिहासकारों के लिखे हुए हैं. ये आठवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक की घटनाओं को दर्शाते हैं कि किस प्रकार हिन्दुओं को इस्लामी जिहाद का सामना करना पड़ा और आज भी करना पड़ रहा है. जिस जौहर और सती प्रथा को हिन्दू धर्म की रूढ़िवादिता कह कर हिन्दू धर्म को त्रुटिपूर्ण ढंग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जा रहा है, वो वास्तव में इस्लाम की देन है. आज परिस्थितियां भिन्न हैं इसलिए हमारा सौभाग्य है कि हमारी बहनों और बेटियों को ऐसे नकारात्मक उपाय करने की आवश्यकता नहीं है.
ये उल्लेख राजवंशों और सैनिकों से सम्बद्ध थे. एक साधारण हिन्दू महिला को विशेषतः यदि वो विधवा हो गयी हो तो किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता होगा, इसकी तो हम कदाचित कल्पना भी नहीं कर सकते. अगले लेख में सती प्रथा को बढ़ने में अंग्रेज़ों की नीतियों ने क्या योगदान किया था, इसकी चर्चा करने की चेष्टा करूंगा.

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

खरज



जिन दिनों अल्लाउद्दीन खिलजी की सल्तनत थी, उन दिनों मिस्र से एक मौलवी भारत भ्रमण पर आया तो वो यहाँ की स्थिति देख कर अत्यंत प्रसन्न था. इस का नाम था मौलाना शमसुद्दीन तुर्क. इस की प्रसन्नता का कारण था कि 
अल्लाउद्दीन ने हिन्दुओं की स्थिति इतनी दयनीय और गिरी हुई बना दी थी कि हिन्दुओं की महिलायों और बच्चों को मुसलामानों के द्वार पर भिक्षा मांगने के लिए विवश कर दिया था. 
ज़ियाउद्दीन कृत तारीख -ऐ - फ़िरोज़ शाही पृष्ठ २९१, २९६-२९७ 
 अल्लाउद्दीन का ये अभिलेखक विकृत प्रसन्नता से लिखता है कि इस सुलतान के राज्य काल में हिन्दुओं को जिस प्रकार कुचल दिया गया है, वैसा न तो कभी भूतकाल में हुआ है और न ही आगे होगा. इस वाक्य का प्रथम अंश तो सच है किन्तु दूसरा अंश झूठ सिद्ध हुआ क्योंकि इस्लाम की शक्ति बढ़ने के साथ साथ हिन्दुओं की समस्याएं अगली कई शताब्दियों तक बढ़ने ही वाली थी.
 ऊपर वर्णित हिन्दुओं की दुर्दशा के कारण यूं तो कई थे किन्तु आर्थिक दुर्दशा का कारण था सुलतान द्वारा हिन्दुओं पर लगाया गया एक भूमि कर जिसे खरज कहा जाता था. खरज का इस्लाम में एक विशेष स्थान है. 
ऐतिहासिक दृष्टि से इस्लाम के पहले खरज गुज़ार खैबर नामक स्थान के यहूदी थे, जिन्हें इस्लाम के जन्मदाता मोहम्मद ने खरज देने की एवेज में ही जीवित छोड़ा था. उल्लेखनीय है कि खैबर के इन यहूदियों के मुखिया की हत्या करने के उपरान्त, उसकी २० वर्षीया आकर्षक विधवा बर्रा को अपने हरम में शामिल कर लिया था. इसका नाम सय्यिदा जुवैरिय्या रख दिया था. उस समय मोहम्मद की आयु लगभग ६० वर्ष थी और उस के हरम में पहले से ही ७ पत्नियां और २ उपस्रियाँ (रखैल) थीं.
 


इस के मुख्यतः तीन उद्देश्य थे. सुलतान को अधिक से अधिक धनवान बनाना, हिन्दुओं के पास केवल इतनी सामग्री छोड़ना कि वे केवल अपने जीवन यापन में लगे रहे और कभी विद्रोह के लिए सर न उठा सकें और तीसरा, हिन्दुओं के स्वाभिमान का नाश करके उन्हें मानसिक स्तर पर नष्ट कर के मुसलमान बनाना.
परिणामतः हिन्दुओं के घरों से सोना और चांदी नाम मात्र को भी नहीं बचा था. उन की महिलायों को मुसलामानों के घरों में छोटे मोटे कार्य कर के वेतन से जीविका चलाना पड़ता था. ज़ियाउद्दीन बारानी आगे हर्षित हो कर लिखता है कि सुलतान हिन्दू किसानों के पास केवल इतनी सामग्री रहने देता है कि वो अपना जीवन जी सकें और अन्य सब कुछ खरज और अन्य करों के रूप में छीन लिया जाता है.  खरज इकठा करने के लिए एक विश्सेश मंत्रालय भी बनाया गया, जिस का नाम था दीवान - ऐ - मुस्ताखाराज.
ये कुचलने वाली कर प्रणाली किसान को अपना अंतिम दाना तक सुलतान द्वारा नियंत्रित मूल्यों पर बेचने के लिए विवश कर देती थी. संभवतः आज का भ्रष्ट तंत्र भी यहीं से सीख ले कर चलता  है.


एक दिन अलाउद्दीन खिलजी ने जब इस्लाम के कानून के अंतर्गत हिन्दुओं के विषय में पोछा तो क़ाज़ी मुघिसुद्दीन ने उसे कहा,  
हिंदुयों को खरज गुज़ार की भांति जीवन व्यतीत करना चाहिए. जब कर अधिकारी उन से खरज देने को कहे तो  हिन्दू को विनम्रता और भय के साथ साथ पूर्ण आदर से कर देना चाहिए. और यदि  अधिकारी की इच्छा उस के मुंह में थूकने की हो तो वो अपना मुंह बिना हिचकिचाए खोलेगा ताकि अधिकारी उस के मुख में थूक सके. अधिकारी का हिन्दू के मुंह में थूकने और हिन्दू द्वारा विनम्रता पूर्वक व्यवहार का उद्देश्य है इस्लाम के परंपरागत दीन को स्थापित करना और झूठे(हिन्दू) धर्म को नीचा दिखाना. अल्लाह इन्हें नीचा दिखाने का आदेश (कुरान में) देता है, क्योंकि हिन्दू सच्चे पैगम्बर के सबसे भयंकर शत्रु हैं. मुस्तफा के आदेशानुसार उन्हें लूटने, मार डालने और बंदी बनाने की व्यवस्था है ताकि वे या तो सच्चे दीन पर चलें अथवा बंधक बना दिए जाएँ या मार दिए जाएँ. अन्य सभी मौलाना और इस्लाम के जानकारों के अनुसार हिंदुयों को दो में से किसी एक को चुनना होगा, इस्लाम अथवा मौत. केवल इमामेआज़म अबू हनीफा के अनुसार हिंदुयों को जिज्या ले कर बख्शा जा सकता है.
ये सुनने के उपरान्त अल्लाउद्दीन, जो कि मौलवियों से अधिक अपने अधिकारियों की सुनता था, हंसने लगा. उसने कहा
मैंने ऐसे कानून को स्थापित कर दिया है कि मेरे आदेश के भय से हिन्दू चूहों की भांति बिल में घुस जाते हैं. और अब तुम मुझसे कह रहे हो कि ये अल्लाह का कानून (शरिया) है कि हिनदुओं को कुचल कर दरिद्र और आज्ञाकारी बना कर रखो. ध्यान रहे, हिन्दू तब तक मुसलामानों के सामने विनम्र और आज्ञाकारी नहीं होंगे जब तक कि वो दरिद्र और बेबस नहीं हो जाते.
इसलिए सुल्तान ने उन्हें बेबस बना दिया. उनकी बेबसी और दरिद्रता इस सीमा तक पहुँच गयी कि कई किसानों को खरज चुकाने के लिए अपनी पत्नी और बच्चों को बेचना पड़ जाता था. भारतीय इतिहास में ये सब से पुरातन अवसर है जहां कर चुकाने के लिए प्रियजनों के बेचे जाने का उल्लेख है. इसके उपरान्त कई शताब्दियों तक भारतीय किसानों और जन साधारण पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों का वर्णन विदेशी यात्रियों द्वारा कई स्थानों पर मिलता है.
अल्लाउद्दीन के पश्चात, घियासुद्दीन तुग़लक ने भी इसी प्रकार का फरमान जारी किया था, जिस के अनुसार:
हिन्दुओं के पास केवल इतनी ही सामग्री छोड़ी जाए कि न तो वो अपने वैभव से इतने शक्तिशाली हो जाएँ कि सर उठा सकें और न इतना कम छोड़ा जाए कि वो भूमि छोड़ कर भाग जाएँ.

मोहम्मद बिन तुग़लक  के शासन काल में कर जैसे कि खरज और जिज्या इतने बढ़ा दिए गए कि जन साधारण अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं से भी वंचित रहने लगे. नागरिकों ने गाँव छोड़ कर वनों में शरण लेना उचित समझा. इस से सुल्तान इतना क्रोधित हो गया कि उसने जंगली जानवरों की भांति इन का ढूंढ ढूंढ कर वध करना आरम्भ कर दिया.
हजिउद्दबिर, ज़फर उल वाली; बरनी पृष्ठ संख्या ४७९-४८० 


सल्तनत के पश्चात जब मुगलों का शासन आया तो बाबर और हुमायूं ने किसानों पर अधिक ध्यान नहीं दिया. अकबर ने एक ओर तो हिन्दुओं को राहत दे दी कि उन से जिज्या लेना बंद हो गया, दूसरी ओर उसने भूमि को कई श्रेणियों में बाँट दिया ताकि किसानों से अधिकतम पूँजी निकाली जा सके. इस से मुग़ल शासनकाल में किसानों की स्थिति और भी बिगड़ने लग गयी. 
मोरलैंड, जिसने मुग़ल काल की कृषि व्यवस्था के अध्ययन किया है, का निष्कर्ष है कि मुग़ल काल में करों में निरंतर वृद्धि होती रही थी. कश्मीर में दो तिहाई तक उपज कर के रूप में वस्सोली जाती थी. सिंध के जागीरदारों से आधी उपज कर स्वरुप ली जाती थी.  
 W.H. Moreland, From Akbar to Aurangzeb, pp. 253-55
गेलिसन, जो १६२९ में भारत आया था, के अनुसार, गुजरात में किसानों से उन की उपज का तीन चौथाई भाग (७५%) कर स्वरुप ले लिया जाता था.  यही निष्कर्ष अन्य यात्रिओं और विशलेषकों डी लेट, फ़्राइएर और वैन ट्विस्ट का है. 
 Moreland in Journal of Indian History, IV, pp. 78-79 and XIV, p. 64
अकबर के अभिलेखक अबू फ़ज़ल के अनुसार - 
यदि बाढ़, अति वृष्टि अथवा अनावृष्टि (सूखा) के कारण उपज नष्ट हो जाती थी तो शासक की ओर से क्षतिपूर्ति तो नहीं मिलती थी, अगले वर्ष ४०%, उस से अगले वर्ष ६०% और उस से अगले वर्ष ८०% उपज ले ली जाती थी. उसके अगले वर्ष प्रचलित दर से कर लिया जाता था. 
 अबू फ़ज़ल द्वारा सावधानी पूर्वक लिखे गए खाते इस की पुष्टि करते हैं. 
 Ain-i-akbari, Jarret, vol. II, p. 73.
इस से स्पष्ट है कि किसान बढ़ते करों के तले दबा ही रहता था. ज्ञात हो कि इस अकबर की ५,००० रानियाँ थी. इतने बड़े हरम के रख रखाव के लिए धन किसानों के खून पसीने से ही आता था. आज के भ्रष्ट मार्क्सवादी इतिहासकार इस अकबर को महान की उपाधि से सजाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते.
उसके  बेटे शाहजहाँ के शासनकाल में किसानों की स्थिति इतनी विकट हो गयी कि खरज चुकाने के लिए किसान अपने बच्चे और पत्नी बेचने पर विवश हो गए थे. 
Manucci, vol. II, p. 451


इसी प्रकार मनरिक (जो १६२८ से १६४३ तक भारत में रहा) लिखता है कि किसानों को पकड़ कर गुलाम मंडियों में बेच दिया जाता था, जहां उनके पीछे पीछे उन की रोटी हुई पत्नियां बिलखते हुए बच्चों को गोद में लिए चल रही होती थीं. बर्निअर इस की पुष्टि करता है कि वो अभागे किसान जो लालची आकाओं को खरज नहीं चुका पाता था, उसके बच्चे उस से छीन कर गुलाम मंडियों में बेच दिए जाते थे. जो बंधुआ मजदूरी की कुप्रथा हम आज भी देखते हैं, ये हमें इस्लाम की ही देन है.
Manrique II, p. 272.

मनुच्ची खरज वसूलने के ढंग पर भी प्रकाश डालते हैं - 
यदि कोई भूखा राक्षस किसी क्षेत्र को नष्ट करना चाहे तो वो राजा के पास जाता है और कहता है,"यदि सुल्तान मुझे कुछ सशस्त्र लड़ाके दे दें और अनुमति दें तो मैं अमुक धन आप को दे दूंगा. ये राशि उस क्षेत्र से मिलने वाली वर्तमान राशि से अधिक होती थी.  राजा के पूछने पर वो बताता कि धन लोगों से एकत्रित किया जाएगा. राजा इन लोगों को अनुमति देने के लिए एक फरमान दे देता था, जो घोषित करता था कि ये व्यक्ति को जागीर प्रदान की जा रही है. इन्हें इजारादार अथवा जागीरदार कहा जाता था. ये अपनी जागीर के प्रत्येक निवासी को पकड़ कर उसे यातना दे दे कर धन एकत्रित करते थे. साधारनतया ये राजा को बतायी हुई राशि से चार गुना धन एकत्रित करते थे. राजा ये सब जानता था कि धन कैसे एकत्रित किया जाता है, वो अपने लालच के लिए सब स्वीकार कर लेता था.
फरमान ले कर जब ये जागीरदार पहुँचता था तो पहला जागीरदार उसे तब तक कार्य नहीं करने देता था, जब तक कि उसे भी कुछ धन भेंट स्वरुप नहीं मिल जाता था. ये धन भी नया जागीरदार किसानों से निकलवाता था. इस प्रकार हर फरमान के साथ खरज तथा अन्य करों की राशी बढती जाती थी.
खरज घ्रिणा, अपमान, भय, क्रूरता, साम्प्रदायिक अत्याचार और उन असीम यातनाओं का प्रतीक है जिसे हिन्दुओं ने कई शताब्दियों तक सहन किया. ये सब सहने के पश्चात भी यदि ये संस्कृति जिसे वैदिक, सनातन, आर्य अथवा हिन्दू संस्कृति के नाम से जाना जाता है तो इसका श्री उन असंख्य पुरुषों और महिलायों को जाता है जो इतनी विकट स्थितियों में भी अदम्य साहस से डेट रहे. यदि हमारे ये पूर्वज, जिन्हें मार्क्सवादी इतिहासकार हमारे स्मृति पटल से लगभग मिटा चुके हैं, संघर्ष न करते तो आज हम भी मिस्र, रोम तथा यूनान की सभ्यताओं की भांति मिट चुके होते और तालिबानियों की भांति अपने पूर्वजों के धर्म का विनाश कर रहे होते.