शनिवार, 11 दिसंबर 2010

जौहर एवं सती प्रथा

इस्लाम की मान्यता के अनुसार नबी मोहम्मद एक सम्पूर्ण पुरुष था और अल्लाह ने उसे सभी मुसलामानों के लिए एक आदर्श के रूप में भेजा है. इसका वर्णन कुरान में इस प्रकार है:-
لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّـهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّـهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّـهَ كَثِيرًا
निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है अर्थात उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अन्तिम दिन की आशा रखता हो और अल्लाह को अधिक याद करे 
Indeed in the Messenger of Allah (Muhammad SAW) you have a good example to follow for him who hopes in (the Meeting with) Allah and the Last Day and remembers Allah much.

इसलिए जिन्होंने पढ़ा हो कि मोहम्मद बालों में मेहंदी लगाता था, तो वो भी मेहँदी लगाते हैं. जिसे पता लगता है कि मोहम्मद मूंछ कटवाता था और दाढ़ी रखता था, वो भी वैसा ही करता है. इसका अर्थ है कि यदि मोहम्मद ने अपने  जीवन काल में कोई भी कार्य किया हो तो प्रत्येक मुसलमान उसे अक्षरशः पालन करने का प्रयत्न करता है क्योंकि ये उस के सम्प्रदाय की मांग है.
मोहम्मद ने अपने जीवन काल में जो महत्त्वपूर्ण कार्य किये थे, उनका संकलन मुसलामानों ने किया है. मोहम्मद के जीवन की इन घटनाओं के विवरण को हदीस कहा जाता है जिसका बहुवचन है अहादीस. इन संकलनों को कई पुस्तकों में संकलित किया गया है किन्तु इन में से छः ऐसी हैं जिन्हें सर्वमान्य कहा जाता है. इन में से भी दो: सही बुखारी और सही मुस्लिम, सर्वोच्च मानी जाती हैं. इन में वर्णित है कि मोहम्मद ने अपने जीवन काल में काफिरों का नरसंहार किया था, मूर्तियों को तोड़ा था, काफिरों को मारने के पश्चात उन की विधवाओं से निकाह किया था (जुवैरिय्या, सफिय्या), उन्हें अपनी उपस्री अर्थात रखैल (रेहाना) बनाया था और उन्हें गुलामी के लिए बेच कर धन कमाया था.
इसलिए जब मुसलामानों ने भारत में शासन स्थापित किया तो मोहम्मद और कुरान के अनुसार हिन्दुओं की महिलाओं से ऐसा ही व्यवहार किया.
भारतवर्ष में जो धर्म और संस्कृति चली आ रही है, उसके अनुसार अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री से संबंध बनाना एक निंदनीय कार्य माना जाता था, किन्तु मुसलामानों को काफिरों की महिलाओं से दुष्कर्म करना कुरान में मान्य किया गया है. सूरा ४ की आयत २४ इसे दर्शाती है:-
وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۖ كِتَابَ اللَّـهِ عَلَيْكُمْ ۚ وَأُحِلَّ لَكُم مَّا وَرَاءَ ذَٰلِكُمْ أَن تَبْتَغُوا بِأَمْوَالِكُم مُّحْصِنِينَ غَيْرَ مُسَافِحِينَ ۚ فَمَا اسْتَمْتَعْتُم بِهِ مِنْهُنَّ فَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةً ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا تَرَاضَيْتُم بِهِ مِن بَعْدِ الْفَرِيضَةِ ۚ إِنَّ اللَّـهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًا
इस का अनुवाद इस प्रकार है:
और शौहरदार औरतें मगर वह औरतें जो (जिहाद में कुफ्फ़ार से) तुम्हारे कब्ज़े में आ जाएं हराम नहीं (ये) ख़ुदा का तहरीरी हुक्म (है जो) तुमपर (फ़र्ज़ किया गया) है और उन औरतों के सिवा (और औरतें) तुम्हारे लिए जायज़ हैं बशर्ते कि बदकारी व ज़िना नहीं बल्कि तुम इफ्फ़त या पाकदामिनी की ग़रज़ से अपने माल (व मेहर) के बदले (निकाह करना) चाहो हॉ जिन औरतों से तुमने मुताअ किया हो तो उन्हें जो मेहर मुअय्यन किया है दे दो और मेहर के मुक़र्रर होने के बाद अगर आपस में (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमें तुमपर कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और मसलेहतों का पहचानने वाला है
And all married women (are forbidden unto you) save those (captives) whom your right hands possess. It is a decree of Allah for you. Lawful unto you are all beyond those mentioned, so that ye seek them with your wealth in honest wedlock, not debauchery. And those of whom ye seek content (by marrying them), give unto them their portions as a duty. And there is no sin for you in what ye do by mutual agreement after the duty (hath been done). Lo! Allah is ever Knower, Wise.
परिणाम स्वरुप, जब इस्लामी आक्रमणकारियों ने भारत में हमले किये और यहाँ शासन स्थापित किया तो हिन्दू महिलाओं के साथ भी हर प्रकार के घृणित व्यवहार किये गए. मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात, ६३२ से लेकर ७१२ तक जितने भी हमले भारतवर्ष पर किये गए, इस्लामिक आक्रमणकारी हिन्दू राजाओं के हाथों या तो परास्त हो गए अथवा मारे गए. इन वर्षों में महिलयों की इस्लामी आक्रान्ताओं द्वारा की जाने वाली दुर्दशा की सूचना हिन्दुओं तक पहुँच चुकी थी.
मुसलामानों के विपरीत, यहाँ के क्षत्रिय युद्ध भी नियमों की मर्यादा में करते थे और महिलाओं में उच्च कोटि के संस्कार थे. परिणामतः आरम्भ हुई एक ऐसी परंपरा जो आज सती के नाम से जानी जाती है.
इस का जो अधिक उपयुक्त शब्द है, वह है जौहर जो जीव हर की संधि से बना है और इस का अर्थ है जीवन को देना. जब ७१२ में सिंध में मोहम्मद बिन क़ासिम ने वहाँ के शासक दाहिर का रणभूमि में वध कर दिया था तो ये सूचना पा कर उसकी बहन बाई ने रावर दुर्ग में उपस्थित सभी महिलायों को संबोधित कर के कहा था:-
अब ये तय है कि हम इन चांडालों और गोमांस भक्षकों के चंगुल से नहीं बच सकतीं. हमारी सुरक्षा और स्वतंत्रता की कोई आशा नहीं है इसलिए हम लकड़ी, कपास और तेल एकत्रित कर के आत्मदाह कर लें ताकि हम अपने पतियों से (स्वर्ग में) शीघ्र ही मिल जाएँ. इस के लिए कोई बाध्य नहीं है. जो शत्रु से याचना करना चाहें वो इस के लिए स्वतंत्र हैं.
वो सब एक मत थीं और उन्होंने एक घर को आग लगा कर उसमे अपने आप को भस्म कर लिया. जो महिलाएं दुर्ग से बाहर थीं, वो इतनी भाग्यशाली नहीं रहीं. मोहम्मद क़ासिम अपने मुसलमान सैनिकों के साथ तीन दिन तक वहाँ रुका था, जिन में उसने ६,००० योद्धाओं का वध किया था और लगभग ६०,००० बंधक बनाए थे. इन सब महिलाओं और बच्चों को मुसलमान बना दिया गया था. इन में ३० युवतियां राजघराने की थीं. इन्हें इराक के शासक हज्जाज के पास भेज दिया गया. जब हज्जाज को ये बंधक मिले तो उन के साथ मोहम्मद बिन क़ासिम ने राजा दाहिर का कटा हुआ सर भी भेजा था. इस कटे सर को देख कर हज्जाज ने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया और नमाज़ अदा की. इन बंधकों में से २०% को उस समय के खलीफा वालिद को भेज दिया गया. खलीफा ने इन में से कुछ को बंदियों के रूप में बेच दिया और कुछ को भेंट स्वरुप मित्रों में बाँट दिया. 
प्रत्येक लूट के माल (जिसे ग़नीमत भी कहते हैं) में से २०%, वो धन हो अथवा महिलाएं, अल्लाह और मोहम्मद के लिए होती थीं. ये परंपरा भी इस्लाम के संस्थापक मोहम्मद ने आरम्भ की थी. मोहम्मद की मृत्यु (६३२) के पश्चात, जो भी खलीफा होता था, उसे अल्लाह का प्रतिनिधि मान कर २०% ग़नीमत उसे दी जाती थी. इस से सम्बंधित आयत है सुरा ८ की आयत ४१:-
وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُم مِّن شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّـهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ إِن كُنتُمْ آمَنتُم بِاللَّـهِ وَمَا أَنزَلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا يَوْمَ الْفُرْقَانِ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ ۗ وَاللَّـهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
इस का अनुवाद इस प्रकार है:
और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ ग़नीमत के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पाँचवा भाग अल्लाह का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफ़िरों का है। यदि तुम अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमने अपने बन्दे पर फ़ैसले के दिन उतारी, जिस दिन दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हूई, और अल्लाह को हर चीज़ की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त है
एक अन्य अनुवाद इस प्रकार है:-
और जान लो कि जो कुछ तुम (माल लड़कर) लूटो तो उनमें का पॉचवॉ हिस्सा मख़सूस ख़ुदा और रसूल और (रसूल के) क़राबतदारों और यतीमों और मिस्कीनों और परदेसियों का है अगर तुम ख़ुदा पर और उस (ग़ैबी इमदाद) पर ईमान ला चुके हो जो हमने ख़ास बन्दे (मोहम्मद) पर फ़ैसले के दिन (जंग बदर में) नाज़िल की थी जिस दिन (मुसलमानों और काफिरों की) दो जमाअतें बाहम गुथ गयी थी और ख़ुदा तो हर चीज़ पर क़ादिर है 
जब ये पांचवां भाग, खलीफा के पास पहुंचा तो इन बंधकों में राजा दाहिर की बहन की बेटी भी थी. जब खलीफा ने उसे देखा तो उस की सुन्दरता को देखता ही रह गया और विस्मय से अपनी अंगुलियाँ चबाने लगा. अब्दुल्लाह बिन अब्बास भी उसे देख कर ललचा रहा था. खलीफा ने कहा,
मेरे भतीजे, मुझे ये लड़की अत्यंत लुभावनी लग रही है और मैं इसे अपने लिए रखना चाहता हूँ. लेकिन यदि तुम चाहते हो तो तुम इसे ले जाओ और इस से अपने बच्चे पैदा करो. इस प्रकार खलीफा की आज्ञा से अब्दुल्लाह उसे ले गया और कई वर्षों तक उसे अपने पास रखा.
चाचनामा - (Elliot and Dowson - pp - 173)


इसके उपरान्त जहां भी हिन्दुओं को ये निश्चित हो जाता कि पराजय हो जायेगी, महिलाएं म्लेच्छों की बांदियाँ बनाने से मर जाना उपयुक्त समझती थीं. इस लेख में कुछ गिनी चुनी घटनाएं सम्मिलित की गयी हैं. इतिहास ऐसी, हिन्दू महिलाओं के रक्त से सनी घटनाओं से भरा पड़ा है, जिन्हें एक राष्ट्रीय षड़यंत्र के अंतर्गत या तो उजागर नहीं होने दिया जाता अथवा उन्हें तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है.


जब अकबर (जिस के हरम में ५,००० महिलाएं थीं) ने चित्तौढ़ पर आक्रमण किया था तो वहाँ भी लगभग ३०० महिलाओं ने जौहर किया था.  
अकबरनामा, खंड २, पृष्ठ ४४२

आज भारत और नेपाल तेराई क्षेत्र में जो थारु  कबीले के नाम से जाने जाते हैं, उस के पीछे भी परोक्ष रूप से जौहर का हाथ है. जब एक वृद्ध सिसोदिया राजपूत राजा को लगा कि मुसलामानों से युद्ध में पराजय लगभग निश्चित है तो उस ने वीरगति को प्राप्त होने का निर्णय कर लिया और युद्ध क्षेत्र न छोड़ने का निर्णय किया. किन्तु अपनी सुन्दर पुत्रियों को वो मुसलमानों के हाथों से बचाना चाहता था. उसने अपने कुछ विश्वसनीय क्षत्रियों और भील सैनिकों के साथ अपनी पुत्रियों को हिमालय में बसे अपने प्रियजनों के पास जाने के लिए रवाना कर दिया. दुर्भाग्य वश बीहड़ जंगलों में मलेरिया तथा अन्य व्याधियों से अधिकतर योद्धयों की मृत्यु हो गयी. जब अंतिम राजपूत मर गया तो इन राजकुमारियों ने अपने भील रक्षकों से कहा कि वे इन्हीं तेरे के वनों में भीलों से विवाह कर के बस जायेंगी. उन्होंने शर्त रखी कि उनके वंश में सदा महिलाएं ही प्रधान होंगी. वे भोजन तो पकाएँगी किन्तु परोसेंगी नहीं. आज भी परंपरा है कि महिलाएं भोजन थाल में रख कर पुरुषों की ओर पाँव से सरका देती हैं.

कभी कभी इन वीरांगनाओं का भाग्य इन का साथ नहीं देता था. सन १६३४ में जब शाहजहाँ की सेना बुंदेला विद्रोह को कुचल रही थी, तब जुझार सिंह बुंदेला के ओरछा क्षेत्र से मुसलामानों द्वारा कई महिलाओं को बंदी बना कर उनसे बड़ी बर्बरता से व्यवहार किया गया था. जुझार सिंह अपने चौरागढ़ के दुर्ग से बहुत सी महिलायों के साथ दक्षिण की ओर भाग निकला. जब उनके घोड़े बिदक गए तो जुझार सिंह ने उन महिलाओं को मार दिया और बची हुई महिलाओं को लेकर गोलकुंडा पहुंचा. अभी वहाँ महिलाएं जौहर पूरा नहीं कर पाई थीं जब मुसलमान पहुँच गए. कुछ ने अपने को तलवार और खंजर से घायल कर लिया था. मुग़ल इन घायल महिलाओं को भी उठा कर ले गए.
Cambridge history of India, Vol. 4, page 195

अमीर खुसरो, जिसे नेहरु से ले कर आज तक के सब बुद्धिजीवी, एक षड़यंत्र के अंतर्गत इस्लाम के उदार मुखौटे के रूप में प्रस्तुत करते हैं, हमें सन १३०१ में मुसलामानों द्वारा रणथम्बौर पर आक्रमण के संबंध में बताता है कि मुसलमान काफिरों के दुर्ग पर बड़े बड़े पत्थर फेंक रहे थे, जिस से कि हिन्दू भयभीत होने लगे थे. एक माह तक दुर्ग को मुसलामानों ने घेरे रखा. हिन्दुओं को भोजन की इतनी कमी हो गई कि अन्न का एक दाना, सोने के दो टुकड़ों के एवेज में मिलता था.
एक रात, राय (राजा) ने पर्वत के शिखर पर अग्नि जलाई और अपनी स्त्रियों तथा अपने प्रियजनों को उस में झोंक दिया और अपने कुछ स्वामिभक्त सेवकों के साथ मुसलामानों पर हमला कर दिया और मारा गया. इस खुशकिस्मती के दिन रणथम्बौर का सशक्त दुर्ग घृणित राय के संहार से जीत लिया गया.
Elliot and Dowson, Volume - 3, pp 72 - तारीख ऐ अल्लाई 

सुल्तान अबुल मुजाहिद मोहम्मद शाह के सैनिकों ने जब सुल्तान के भतीजे बहाउद्दीन को पकड़ने के लिए काम्पिल्य को घेर लिया (जो वहाँ के राजा की शरण में था) तोअफ्रीका से आया हुआ इब्न बतूता लिखता है:
 जब उस काफिर (हिन्दू राजा) ने अपने ऊपर आये संकट को भांप लिया. उसका अनाज का भण्डार लगभग रिक्त था और उसे भय था कि मुसलमान उसे बंधक बना लेंगे. उस ने बहाउद्दीन से कहा, "तुम स्थिति को देख ही रहे हो. मैंने अपने कुल के साथ मरने का निर्णय कर लिया है. तुम उस (हिन्दू राजा का नाम लेते हुए) राजा की शरण में चले जाओ, वो तुम्हारी सुरक्षा करेगा". उस ने किसी को उसे राह दिखाने के लिए भेज दिया. फिर उस ने अग्नि जलाई और अपनी पत्नी और पुत्रिओं से कहा,"मैं मरने जा रहा हूँ. तुम में से जो चाहें वो भी ऐसा कर सकते हैं". इसके पश्चात्, सभी महिलाओं ने स्नान किया, अपने शरीर पर चन्दन का लेप लगाया, भूमि को चूमा और अग्नि में कूद गयीं. वे सब मर गयीं. राजा के मंत्रिओं और मुखियाओं की महिलाओं ने भी यही किया. इस के उपरान्त राजा ने स्नान किया, चन्दन कअ लेप लगाया, अपने अस्त्र शस्त्र उठाए और कवच के बिना युद्ध के लिए चल पड़ा. उस के सभी सेवकों ने भी उस का अनुसरण किया. वे तब तक लड़ते रहे जब तक कि मर नहीं गए. नगर के निवासियों को बंधक बना लिया गया. राजा के ११ बेटे भी बंधक बना लिए गए. सुल्तान ने उन्हें मुसलमान बना दिया.
The travels of Ibn Batuta
इन मुसलमान शासकों का घिनौना रूप छिपाने के लिए एक कुतर्क दिया जाता है कि राजपूत अपने झूठे अहंकार के चलते सती अथवा जौहर जैसे कृत्य करते थे. इस का खंडन तारीख ऐ फ़िरोज़ शाही में मिल जाता है. इस का लेखक अब्बास खान लिखता है कि जब काफिर पूरण मल को पता लगा कि उस के पड़ाव को सुल्तान ने घेर लिया है तो वो अपनी प्रिय पत्नी रत्नावली के पास गया और उस का गला काट दिया. इसके पश्चात उसने अपने साथियों से भी ऐसा ही करने को कहा. उन्होंने अपनी महिलाओं का वध कर दिया. इतने में अफगानों ने हिन्दुओं को घेर लिया और चारों ओर से उन्हें मारना आरम्भ कर दिया. काफिरों ने खाड़ी के सूयरों की भांति वीरता दिखाई पर शीघ्र ही मार दिए गए. उनकी जो महिलाएं और प्रियजन बच गए थे, उन्हें बंदी बना लिया गया. इन में से पूरण मल की एक पुत्री और उस के भाई के तीन पुत्रों के अतिरिक्त सभी को मार दिया गया. बाद में पूरण मल की बेटी एक बाज़ीगर को दे दी गयी ताकि उसे बाजारों में नचाया जा सके. तीनों लड़कों को हिजड़ा बना दिया गया ताकि उस का कुल नष्ट हो जाए.


एक और कुतर्क जिस से इस्लामी शासकों की बर्बरता को कम कर के दर्शाने का प्रयत्न होता है वो है कि शत्रु को मारना तो युद्ध नीति के अंतर्गत है, इस में सम्प्रदाय को नहीं लाना चाहिए. यदि इन शासकों ने ये दुर्व्यवहार सम्प्रदाय को ध्यान में न रखते हुए किया हो तो इसे उचित माना जा सकता है. किन्तु वास्तविकता ये है कि ये शासक यहाँ शासन नहीं जिहाद करने आये थे और इसे पूरे गर्व से अपनी ही लेखनी से स्वीकार भी करते थे. इस कुतर्क का उत्तर भी मुसलमान इतिहासकारों की लेखनी से ही मिल जाता है.

प्रस्तुत घटना शाह जहां के शासन काल की है जब औरंगजेब ने कल्याणी पर आक्रमण किया था. मुग़ल सेना ने एक दुर्ग को घेर लिया था. उल्लेख इस प्रकार है:
घिरे हुए सैनिकों ने कड़ा संघर्ष किया और बानों और रॉकेटों की वर्षा कि. हथगोले, मिटटी तेल के गोले और जलती हुई वस्तुएं शाही सेना पर गिराई, लेकिन आक्रमणकारी वीरता से आगे बढ़ते रहे क्योंकि जीत निश्चित थी. इस अवसर पर, दिलावर हब्शी, जो इस दुर्ग की सुरक्षा आदिल खान की ओर से अपने २,५०० सैनिकों के साथ कर रहा था अपनी स्थिति को भांप गया. उसने क्षमा याचना के लिए एक पत्र भेज कर आत्म समर्पण का प्रस्ताव दिया. क्योंकि सभी सैनिक मुसलमान थे, सभी को अपनी संपत्ति, पत्निओं और प्रियजनों सहित जाने की अनुमति मिल गयी. राजकुमार औरंगज़ेब ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
कुछ ऐसा ही तैमुर लंग ने किया था. उसकी आत्मकथा मल्फुज़ती तैमूरी में लोनी  नामक दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त वो उल्लेख करता है:
बहुत से राजपूतों ने अपनी पत्नियों और बच्चों को अपने घरों में ले जाकर उन्हें जला दिया और इसके उपरान्त वो युद्ध क्षेत्र में डट गए और मारे गए. दुर्ग के अन्य सैनिकों  ने भी युद्ध किया, जिन में से कई मारे गए और कई बंधक बना लिए गए. अगली प्रातः मैंने आदेश दिया कि मुसलमान सैनिकों को क्षमा कर दिया जाए और काफिरों को तलवार से नरक में भेज दिया जाए. मैंने ये आदेश भी दिया कि आस पास के घरों में से सय्यिदों, शेखों और मुसलामानों के घरों को सुरक्षित रख के अन्य सभी घरों को लूट लिया जाए और दुर्ग को नष्ट कर दिया जाए. ऐसा ही किया गया और हमें बड़ी मात्र में लूट का माल मिला.
यहाँ दिए गए सभी उल्लेख मुसलमान इतिहासकारों के लिखे हुए हैं. ये आठवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक की घटनाओं को दर्शाते हैं कि किस प्रकार हिन्दुओं को इस्लामी जिहाद का सामना करना पड़ा और आज भी करना पड़ रहा है. जिस जौहर और सती प्रथा को हिन्दू धर्म की रूढ़िवादिता कह कर हिन्दू धर्म को त्रुटिपूर्ण ढंग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जा रहा है, वो वास्तव में इस्लाम की देन है. आज परिस्थितियां भिन्न हैं इसलिए हमारा सौभाग्य है कि हमारी बहनों और बेटियों को ऐसे नकारात्मक उपाय करने की आवश्यकता नहीं है.
ये उल्लेख राजवंशों और सैनिकों से सम्बद्ध थे. एक साधारण हिन्दू महिला को विशेषतः यदि वो विधवा हो गयी हो तो किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता होगा, इसकी तो हम कदाचित कल्पना भी नहीं कर सकते. अगले लेख में सती प्रथा को बढ़ने में अंग्रेज़ों की नीतियों ने क्या योगदान किया था, इसकी चर्चा करने की चेष्टा करूंगा.

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

खरज



जिन दिनों अल्लाउद्दीन खिलजी की सल्तनत थी, उन दिनों मिस्र से एक मौलवी भारत भ्रमण पर आया तो वो यहाँ की स्थिति देख कर अत्यंत प्रसन्न था. इस का नाम था मौलाना शमसुद्दीन तुर्क. इस की प्रसन्नता का कारण था कि 
अल्लाउद्दीन ने हिन्दुओं की स्थिति इतनी दयनीय और गिरी हुई बना दी थी कि हिन्दुओं की महिलायों और बच्चों को मुसलामानों के द्वार पर भिक्षा मांगने के लिए विवश कर दिया था. 
ज़ियाउद्दीन कृत तारीख -ऐ - फ़िरोज़ शाही पृष्ठ २९१, २९६-२९७ 
 अल्लाउद्दीन का ये अभिलेखक विकृत प्रसन्नता से लिखता है कि इस सुलतान के राज्य काल में हिन्दुओं को जिस प्रकार कुचल दिया गया है, वैसा न तो कभी भूतकाल में हुआ है और न ही आगे होगा. इस वाक्य का प्रथम अंश तो सच है किन्तु दूसरा अंश झूठ सिद्ध हुआ क्योंकि इस्लाम की शक्ति बढ़ने के साथ साथ हिन्दुओं की समस्याएं अगली कई शताब्दियों तक बढ़ने ही वाली थी.
 ऊपर वर्णित हिन्दुओं की दुर्दशा के कारण यूं तो कई थे किन्तु आर्थिक दुर्दशा का कारण था सुलतान द्वारा हिन्दुओं पर लगाया गया एक भूमि कर जिसे खरज कहा जाता था. खरज का इस्लाम में एक विशेष स्थान है. 
ऐतिहासिक दृष्टि से इस्लाम के पहले खरज गुज़ार खैबर नामक स्थान के यहूदी थे, जिन्हें इस्लाम के जन्मदाता मोहम्मद ने खरज देने की एवेज में ही जीवित छोड़ा था. उल्लेखनीय है कि खैबर के इन यहूदियों के मुखिया की हत्या करने के उपरान्त, उसकी २० वर्षीया आकर्षक विधवा बर्रा को अपने हरम में शामिल कर लिया था. इसका नाम सय्यिदा जुवैरिय्या रख दिया था. उस समय मोहम्मद की आयु लगभग ६० वर्ष थी और उस के हरम में पहले से ही ७ पत्नियां और २ उपस्रियाँ (रखैल) थीं.
 


इस के मुख्यतः तीन उद्देश्य थे. सुलतान को अधिक से अधिक धनवान बनाना, हिन्दुओं के पास केवल इतनी सामग्री छोड़ना कि वे केवल अपने जीवन यापन में लगे रहे और कभी विद्रोह के लिए सर न उठा सकें और तीसरा, हिन्दुओं के स्वाभिमान का नाश करके उन्हें मानसिक स्तर पर नष्ट कर के मुसलमान बनाना.
परिणामतः हिन्दुओं के घरों से सोना और चांदी नाम मात्र को भी नहीं बचा था. उन की महिलायों को मुसलामानों के घरों में छोटे मोटे कार्य कर के वेतन से जीविका चलाना पड़ता था. ज़ियाउद्दीन बारानी आगे हर्षित हो कर लिखता है कि सुलतान हिन्दू किसानों के पास केवल इतनी सामग्री रहने देता है कि वो अपना जीवन जी सकें और अन्य सब कुछ खरज और अन्य करों के रूप में छीन लिया जाता है.  खरज इकठा करने के लिए एक विश्सेश मंत्रालय भी बनाया गया, जिस का नाम था दीवान - ऐ - मुस्ताखाराज.
ये कुचलने वाली कर प्रणाली किसान को अपना अंतिम दाना तक सुलतान द्वारा नियंत्रित मूल्यों पर बेचने के लिए विवश कर देती थी. संभवतः आज का भ्रष्ट तंत्र भी यहीं से सीख ले कर चलता  है.


एक दिन अलाउद्दीन खिलजी ने जब इस्लाम के कानून के अंतर्गत हिन्दुओं के विषय में पोछा तो क़ाज़ी मुघिसुद्दीन ने उसे कहा,  
हिंदुयों को खरज गुज़ार की भांति जीवन व्यतीत करना चाहिए. जब कर अधिकारी उन से खरज देने को कहे तो  हिन्दू को विनम्रता और भय के साथ साथ पूर्ण आदर से कर देना चाहिए. और यदि  अधिकारी की इच्छा उस के मुंह में थूकने की हो तो वो अपना मुंह बिना हिचकिचाए खोलेगा ताकि अधिकारी उस के मुख में थूक सके. अधिकारी का हिन्दू के मुंह में थूकने और हिन्दू द्वारा विनम्रता पूर्वक व्यवहार का उद्देश्य है इस्लाम के परंपरागत दीन को स्थापित करना और झूठे(हिन्दू) धर्म को नीचा दिखाना. अल्लाह इन्हें नीचा दिखाने का आदेश (कुरान में) देता है, क्योंकि हिन्दू सच्चे पैगम्बर के सबसे भयंकर शत्रु हैं. मुस्तफा के आदेशानुसार उन्हें लूटने, मार डालने और बंदी बनाने की व्यवस्था है ताकि वे या तो सच्चे दीन पर चलें अथवा बंधक बना दिए जाएँ या मार दिए जाएँ. अन्य सभी मौलाना और इस्लाम के जानकारों के अनुसार हिंदुयों को दो में से किसी एक को चुनना होगा, इस्लाम अथवा मौत. केवल इमामेआज़म अबू हनीफा के अनुसार हिंदुयों को जिज्या ले कर बख्शा जा सकता है.
ये सुनने के उपरान्त अल्लाउद्दीन, जो कि मौलवियों से अधिक अपने अधिकारियों की सुनता था, हंसने लगा. उसने कहा
मैंने ऐसे कानून को स्थापित कर दिया है कि मेरे आदेश के भय से हिन्दू चूहों की भांति बिल में घुस जाते हैं. और अब तुम मुझसे कह रहे हो कि ये अल्लाह का कानून (शरिया) है कि हिनदुओं को कुचल कर दरिद्र और आज्ञाकारी बना कर रखो. ध्यान रहे, हिन्दू तब तक मुसलामानों के सामने विनम्र और आज्ञाकारी नहीं होंगे जब तक कि वो दरिद्र और बेबस नहीं हो जाते.
इसलिए सुल्तान ने उन्हें बेबस बना दिया. उनकी बेबसी और दरिद्रता इस सीमा तक पहुँच गयी कि कई किसानों को खरज चुकाने के लिए अपनी पत्नी और बच्चों को बेचना पड़ जाता था. भारतीय इतिहास में ये सब से पुरातन अवसर है जहां कर चुकाने के लिए प्रियजनों के बेचे जाने का उल्लेख है. इसके उपरान्त कई शताब्दियों तक भारतीय किसानों और जन साधारण पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों का वर्णन विदेशी यात्रियों द्वारा कई स्थानों पर मिलता है.
अल्लाउद्दीन के पश्चात, घियासुद्दीन तुग़लक ने भी इसी प्रकार का फरमान जारी किया था, जिस के अनुसार:
हिन्दुओं के पास केवल इतनी ही सामग्री छोड़ी जाए कि न तो वो अपने वैभव से इतने शक्तिशाली हो जाएँ कि सर उठा सकें और न इतना कम छोड़ा जाए कि वो भूमि छोड़ कर भाग जाएँ.

मोहम्मद बिन तुग़लक  के शासन काल में कर जैसे कि खरज और जिज्या इतने बढ़ा दिए गए कि जन साधारण अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं से भी वंचित रहने लगे. नागरिकों ने गाँव छोड़ कर वनों में शरण लेना उचित समझा. इस से सुल्तान इतना क्रोधित हो गया कि उसने जंगली जानवरों की भांति इन का ढूंढ ढूंढ कर वध करना आरम्भ कर दिया.
हजिउद्दबिर, ज़फर उल वाली; बरनी पृष्ठ संख्या ४७९-४८० 


सल्तनत के पश्चात जब मुगलों का शासन आया तो बाबर और हुमायूं ने किसानों पर अधिक ध्यान नहीं दिया. अकबर ने एक ओर तो हिन्दुओं को राहत दे दी कि उन से जिज्या लेना बंद हो गया, दूसरी ओर उसने भूमि को कई श्रेणियों में बाँट दिया ताकि किसानों से अधिकतम पूँजी निकाली जा सके. इस से मुग़ल शासनकाल में किसानों की स्थिति और भी बिगड़ने लग गयी. 
मोरलैंड, जिसने मुग़ल काल की कृषि व्यवस्था के अध्ययन किया है, का निष्कर्ष है कि मुग़ल काल में करों में निरंतर वृद्धि होती रही थी. कश्मीर में दो तिहाई तक उपज कर के रूप में वस्सोली जाती थी. सिंध के जागीरदारों से आधी उपज कर स्वरुप ली जाती थी.  
 W.H. Moreland, From Akbar to Aurangzeb, pp. 253-55
गेलिसन, जो १६२९ में भारत आया था, के अनुसार, गुजरात में किसानों से उन की उपज का तीन चौथाई भाग (७५%) कर स्वरुप ले लिया जाता था.  यही निष्कर्ष अन्य यात्रिओं और विशलेषकों डी लेट, फ़्राइएर और वैन ट्विस्ट का है. 
 Moreland in Journal of Indian History, IV, pp. 78-79 and XIV, p. 64
अकबर के अभिलेखक अबू फ़ज़ल के अनुसार - 
यदि बाढ़, अति वृष्टि अथवा अनावृष्टि (सूखा) के कारण उपज नष्ट हो जाती थी तो शासक की ओर से क्षतिपूर्ति तो नहीं मिलती थी, अगले वर्ष ४०%, उस से अगले वर्ष ६०% और उस से अगले वर्ष ८०% उपज ले ली जाती थी. उसके अगले वर्ष प्रचलित दर से कर लिया जाता था. 
 अबू फ़ज़ल द्वारा सावधानी पूर्वक लिखे गए खाते इस की पुष्टि करते हैं. 
 Ain-i-akbari, Jarret, vol. II, p. 73.
इस से स्पष्ट है कि किसान बढ़ते करों के तले दबा ही रहता था. ज्ञात हो कि इस अकबर की ५,००० रानियाँ थी. इतने बड़े हरम के रख रखाव के लिए धन किसानों के खून पसीने से ही आता था. आज के भ्रष्ट मार्क्सवादी इतिहासकार इस अकबर को महान की उपाधि से सजाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते.
उसके  बेटे शाहजहाँ के शासनकाल में किसानों की स्थिति इतनी विकट हो गयी कि खरज चुकाने के लिए किसान अपने बच्चे और पत्नी बेचने पर विवश हो गए थे. 
Manucci, vol. II, p. 451


इसी प्रकार मनरिक (जो १६२८ से १६४३ तक भारत में रहा) लिखता है कि किसानों को पकड़ कर गुलाम मंडियों में बेच दिया जाता था, जहां उनके पीछे पीछे उन की रोटी हुई पत्नियां बिलखते हुए बच्चों को गोद में लिए चल रही होती थीं. बर्निअर इस की पुष्टि करता है कि वो अभागे किसान जो लालची आकाओं को खरज नहीं चुका पाता था, उसके बच्चे उस से छीन कर गुलाम मंडियों में बेच दिए जाते थे. जो बंधुआ मजदूरी की कुप्रथा हम आज भी देखते हैं, ये हमें इस्लाम की ही देन है.
Manrique II, p. 272.

मनुच्ची खरज वसूलने के ढंग पर भी प्रकाश डालते हैं - 
यदि कोई भूखा राक्षस किसी क्षेत्र को नष्ट करना चाहे तो वो राजा के पास जाता है और कहता है,"यदि सुल्तान मुझे कुछ सशस्त्र लड़ाके दे दें और अनुमति दें तो मैं अमुक धन आप को दे दूंगा. ये राशि उस क्षेत्र से मिलने वाली वर्तमान राशि से अधिक होती थी.  राजा के पूछने पर वो बताता कि धन लोगों से एकत्रित किया जाएगा. राजा इन लोगों को अनुमति देने के लिए एक फरमान दे देता था, जो घोषित करता था कि ये व्यक्ति को जागीर प्रदान की जा रही है. इन्हें इजारादार अथवा जागीरदार कहा जाता था. ये अपनी जागीर के प्रत्येक निवासी को पकड़ कर उसे यातना दे दे कर धन एकत्रित करते थे. साधारनतया ये राजा को बतायी हुई राशि से चार गुना धन एकत्रित करते थे. राजा ये सब जानता था कि धन कैसे एकत्रित किया जाता है, वो अपने लालच के लिए सब स्वीकार कर लेता था.
फरमान ले कर जब ये जागीरदार पहुँचता था तो पहला जागीरदार उसे तब तक कार्य नहीं करने देता था, जब तक कि उसे भी कुछ धन भेंट स्वरुप नहीं मिल जाता था. ये धन भी नया जागीरदार किसानों से निकलवाता था. इस प्रकार हर फरमान के साथ खरज तथा अन्य करों की राशी बढती जाती थी.
खरज घ्रिणा, अपमान, भय, क्रूरता, साम्प्रदायिक अत्याचार और उन असीम यातनाओं का प्रतीक है जिसे हिन्दुओं ने कई शताब्दियों तक सहन किया. ये सब सहने के पश्चात भी यदि ये संस्कृति जिसे वैदिक, सनातन, आर्य अथवा हिन्दू संस्कृति के नाम से जाना जाता है तो इसका श्री उन असंख्य पुरुषों और महिलायों को जाता है जो इतनी विकट स्थितियों में भी अदम्य साहस से डेट रहे. यदि हमारे ये पूर्वज, जिन्हें मार्क्सवादी इतिहासकार हमारे स्मृति पटल से लगभग मिटा चुके हैं, संघर्ष न करते तो आज हम भी मिस्र, रोम तथा यूनान की सभ्यताओं की भांति मिट चुके होते और तालिबानियों की भांति अपने पूर्वजों के धर्म का विनाश कर रहे होते.

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

सय्यिदा जुवैरिय्या

तथ्यों की प्रमाणिकता
 
मोहम्मद की आठवीं पत्नी थी जुवैरिय्या बिन्त अल हैरिथ. वो मोहम्मद के हाथ कैसे लगी, इस के लिए इस्लामी पुस्तकों का सहारा लेते हैं.
इस्लाम की सर्वमान्य पुस्तक सही बुखारी के खंड ३, पुस्तक ४६ के अंक ७१७ में व्याख्याकार इब्न औन के अनुसार:
मैंने नफी को एक पत्र लिखा था जिस के प्रत्युत्तर में उसने मुझे लिखा कि नबी ने एक दिन बिना चेतावनी दिए बनी मुस्तालिक पर आक्रमण कर दिया. उस समय वो अपने पशुयों को पानी पिला रहे थे. उन के लड़ाके मार दिए गए और उनकी महिलायों और बच्चों को बंधक बना लिया गया; नबी को उस दिन जुवैरिय्या मिली. नफी ने लिखा था कि ये सूचना मुझे नबी के लड़ाके इब्न उम्र ने दी थी.
इसी के सन्दर्भ में दूसरी सर्वमान्य हदीस सही मुस्लिम ४२९२ के अनुसार:
इब्न औन ने बताया: मैंने नफी से पूछा कि काफिरों को मारने से पहले क्या उन्हें इस्लाम अपनाने का न्यौता देना आवश्यक है. उस ने उत्तर में लिखा कि इस्लाम के प्रारम्भ में तो ये आवश्यक था. अल्लाह के पैगम्बर ने बनी मुस्तालिक पर आक्रमण किया जब वो असावधान थे और अपने पशुओं को पानी पिला रहे थे. उसने उन सब को मार दिया जो लादे. उसी दिन उस ने जुवैरिय्या को बंदी बनाया था. नफी ने बताया कि ये सब उसे अब्दुल्लाह ने बताया था जो मोहम्मद के साथ उस हमले में उपस्थित था.
 पति की हत्या 

इन दोनों उल्लेखों में बनी मुस्तालिक नामक जिस कसबे का उल्लेख है, वो एक अरबी क़स्बा था जिस का मुखिया हैरिथ नामक व्यक्ति था. उसकी आकर्षक बेटी मुसाफिन बिन सफवान नामक युवक से विवाहित थी. जैसा कि इन उल्लेखों से स्पष्ट है कि यहाँ के निवासी आक्रमण की अपेक्षा नहीं कर रहे थे. हैरिथ ने जब आक्रमण कारियों को देखा तो भाग खड़ा हुआ. मुसाफिन बिन सफवान ने संघर्ष किया और १० अन्य निवासियों सहित वीर गति को प्राप्त हो गया. मोहम्मद के एक साथी की मौत हुई वो भी एक मुसलमान द्वारा भूल से अपने ही साथी पर प्रहार का परिणाम था. मोहम्मद द्वारा बनायी परंपरा के अनुसार, बनी मुस्तालिक की सारी संपत्ति मुसलामानों ने लूट ली और आपस में बाँट ली. इस माल में लगभग २०० परिवार, २००० ऊंट, ५,००० भेड़ बकरियां और बहुत सा घरेलु सामान था. 

जुवैरिय्या - लूट का माल (ग़नीमत)
 
बांटने का ढंग था कि २०% भाग मोहम्मद तथा उस के परिवार के लिए होता था. शेष में से हर घुड़सवार को तीन भाग और पैदल को एक भाग मिलता था. घुड़सवारों को अधिक भाग देना, मोहम्मद का घुड़सवार सैनिकों को प्रोत्साहन देना था. 

जुवैरिय्या का मूल्यांकन 
सभी बंधकों को ले कर मोहम्मद मदीना पहुँच गया. इन बंधकों के प्रियजन उन्हें स्वतंत्र करवाने के लिए धन ले कर आ गए. जब बंधक महिलायों और बच्चों को निर्जीव वस्तुयों की भांति बांटा गया तब जुवैरिय्या थाबित नामक मदिनावासी के भाग में आई थी. उसने जुवैरिय्या की सुन्दरता को देख कर उसे स्वतंत्र करने का मूल्य ९ औंस सोना रखा. इतना धन वो कहीं से नहीं ला सकती थी, इसलिए वो मोहम्मद के पास, जो अपनी १२ वर्षीया पत्नी आयेशा के कक्ष में था, दया याचना के लिए आई. 

आयेशा के विचार 
आयेशा के अनुसार,
वो एक अत्यंत आकर्षक महिला थी. वो उसे देखने वाले हर पुरुष का मन मोह लेती थी. मैंने जब उसे अपने कक्ष के द्वार पर देखा, मुझे वो अच्छी नहीं लगी.

मोहम्मद पर प्रभाव
उसकी याचना सुनाने के पश्चात मोहम्मद ने उस से कहा 
यदि मैं तुम्हें इस से बेहतर विकल्प दूं . 
जुवैरिय्या के पूछने पर मोहम्मद ने कहा
यदि मैं तुम्हारा मूल्य चुका के तुमसे निकाह कर लूं. तत्पश्चात ६० वर्षीय मोहम्मद ने २० वर्षीया विधवा को अपने हरम में शामिल कर लिया. 

जुवैरिय्या का नमाज़ पढ़ना  
इस्लामी पुस्तक उसुद उल घाबा के अनुसार, मोहम्मद जब भी जुवैरिय्या के पास जाता तो उसे नमाज़ अदा करते हुए पाता. जब वो दुबारा आता तब भी उसे नमाज़ करते हुए पाता. एक दिन उस ने जुवैरिय्या से कहा:
मैं तुम्हें कुछ ऐसे शब्द बताता हूँ जो तुम्हारी नमाज़ से अधिक प्रभावशाली होंगे. तुम कहो,"सुबहान अल्लाहे अददा खल्किही, सुभान अल्लाहे रिधा नफ्सेहे, सुभान अल्लाहे जिनता आर्शेहे, सुभाना अल्लाह मिदद्दा कलिमातिही".
कुछ लोगों का मानना है कि नमाज़ पढना मोहम्मद से बचने के लिए जुवैरिय्या का उपाय था क्योंकि वो मोहम्मद को अपने बचपन के साथी और अपने पति मुसाफिन का हत्यारा मानती थी. मोहम्मद से विवाह का प्रस्ताव स्वीकारने के अतिरिक्त उस के पास और कोई बेहतर विकल्प नहीं था. किन्तु मोहम्मद ने इस सुझाव से जुवैरिय्या का नमाज़ वाला उपाय विफल कर दिया. यदि नमाज़ का ये विकल्प है तो क्यों विश्व भर के मुसलमान प्रतिदिन ५ बार समय नष्ट करते हैं.
सत्य क्या है, ये हम नहीं जानते.

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

सफिय्या बिन्त हुवाय

आक्रमण  
सन ६२८ में जब मोहम्मद की आयु लगभग ६० वर्ष थी, उसने नौंवां निकाह सफिय्या नामक १७ वर्षीया युवती से किया था.  अगस्त ६२८ में, मोहम्मद ने अपने १६०० मुसलामानों के साथ खैबर पर आक्रमण किया. इन में १००  घुड़सवार भी थे. मदीना से खैबर की दूरी, जो लगभग १०० मील है, इतनी शीघ्रता से पूरी कर ली कि खैबर के किसान प्रातः काल जब अपने खेतों को जाने लगे तो उन्होंने इस विशाल सेना को देखा और घबरा कर उलटे पाँव अपने नगर में घुस गए. इस अचानक आक्रमण ने खैबर के मित्र कबीले बनी घताफान से सहायता का मार्ग बंद कर दिया. मोहम्मद ने ऐसे स्थान पर मोर्चा संभाला कि घताफान सहायता न कर पायें. 

खैबर 

खैबर की उपजायु घाटी खजूर के वृक्षों और मक्की के खेतों से भारी थी और उस में कई छोटे गाँव और दुर्ग थे. इस से पहले कि निवासी अपनी रक्षा कर पाते, एक एक कर के इन पर आक्रमण कर के अधिकार कर लिया गया. मोहम्मद प्रसन्नता से चिल्लाते हुए,
खैबर का नाश हो गया, अल्लाहु अकबर. जब मैं कहीं जाता हूँ तो उन लोगों के लिए अशुभ होता है
इन छोटे गाँवों पर अधिकार करने के पश्चात मुसलमान कैमस्स दुर्ग पहुंचे. 

संघर्ष और समर्पण  

अब तक कुछ यहूदी अपने मुखिया किनाना के साथ संगठित हो चुके थे. ये किनाना उसी अबुल हक्कीक का पोता था जिसे एक वर्ष पूर्व कुछ मुसलामानों ने मोहम्मद के आदेश पर, उस के घर में घुस कर मार दिया था. यहूदियों ने भीषण संघर्ष किया किन्तु पराजित हो गए. ९३ यहूदी और १९ मुसलमान मारे गए. यहूदियों ने आत्म समर्पण कर दिया. 

किनाना का वध 

समर्पण के नियम अनुसार यहूदियों को अपनी सारी संपत्ति छोड़ कर देश से पलायन करना था. सब के साथ साथ, किनाना अपने एक चचेरे भाई के साथ बाहर आया. मोहम्मद ने उस पर नियमों के विरुद्ध कोष का एक अंश छिपाने का आरोप लगाया, जिस में वो धन भी था जो किनाना को अपनी दुल्हन सफिय्या से मिला था, जिस का पिता कुरैज़ा के नरसंहार में मुसलामानों द्वारा मार दिया गया था.  उसने किनाना से पूछा,
सोने के वो बर्तन कहाँ हैं जो तुम मक्का के लोगों को उधार दिया करते थे? 
उस ने कहा कि वो अब उस के पास नहीं हैं. मोहम्मद ने कहा,
यदि मुझे पता लग गया कि तुम ने मुझ से कुछ छिपाया है तो तेरे प्रियजन मेरे रहमो करम पर होंगे. 
किनाना ने सहमती जाता दी. 
एक कायर यहूदी ने मोहम्मद को उस स्थान की सूचना दी जहां कुछ मूल्यवान वस्तुएं छिपा कर रखी हुई थीं. मोहम्मद ने अपने आदमियों से वो वस्तुएं लाने को कहा. वस्तुएं मिलने पर किनाना को भयंकर यातना दी गयी. और मूल्यवान वस्तुयों की जानकारी लेने के लिए, उस के वक्ष स्थल पर आग लगा दी गयी जिस से कि वो मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया. इसके पश्चात मोहम्मद ने आदेश दिया और किनाना तथा उसके चचेरे भाई का सर काट कर अलग कर दिया गया. 

सफिय्या 

तत्पश्चात मोहम्मद ने अपने हब्शी सेवक बिलाल को किनाना की दुल्हन सफिय्या को पकड़ कर लाने को कहा, जो एक १७ वर्षीया आकर्षक युवती थी. उसकी सुन्दरता सारे मदीना में चर्चित थी. बिलाल शीघ्र ही सफिय्या और उस कि एक मौसेरी बहन को पकड़ कर उनके प्रियजनों के शवों के मध्य से किनाना और उसके भाई के शव के पास ले आया.
वहाँ  का वीभत्स दृश्य देख कर सफिय्या की साथी रोते हुए अपने चेहरे को पीटने लगी और अपने सर में धुल मलने लग गयी. इस पर मोहम्मद ने क्रोधित स्वर में कहा,
इस डायन को यहाँ से ले जाओ.  
एक ओर जा कर मोहम्मद ने बिलाल को उन्हें उनके प्रियजनों के शवों में से लाने पर डांटा. इस पर बिलाल ने कहा,"मैं उनका भय और क्रोध देखने के लिए ही उन्हें वहाँ से लाया था". मोहम्मद सफिय्या की और घूमा और अपना  चोगा उस पर डाल दिया और उसे बिलाल के सरंक्षण में छोड़ दिया. ये संकेत था कि उस ने सफिय्या को अपने लिए चुन लिया है. मोहम्मद का एक साथी भी इस यहूदी सुंदरी के लिए लालायित था किन्तु मोहम्मद ने उसे सफिय्या की मौसेरी बहन दे दी. 

बीवी अथवा रखैल 

मोहम्मद ने अपनी एक सेविका को सफिय्या को मोहम्मद के लिए सजा कर प्रस्तुत करने को कहा. जब भोज (दावत) समाप्त हुआ तो मुसलमान आपस में कहने लगे कि देखते हैं कि मोहम्मद सफिय्या को अपनी उपस्री (रखैल) बनाता है अथवा बीवी. इस उत्तेजना का कारण ये था कि गत वर्ष मोहम्मद ने दो आक्रमणों में ऐसे ही दो युवतियों को अपने लिए चुना था. 'बनी क़ुरैज़ा' नामक बस्ती के ८०० - ९०० पुरुषों के गले काटने के उपरान्त, मोहम्मद ने रिहाना नामक युवती को चुना था जिसे उस ने अपनी उपस्री बनाया थी और उस से पूर्व 'बनी मुस्तालिक' नामक अरबी कबीले की सुंदरी सय्यिदा जुवैरिय्या को अपनी आठवीं बीवी बनाया था. जब मोहम्मद ने सफिय्या के लिए पर्दा लाने को कहा तो वे समझ गए कि इस से निकाह करेगा. मोहम्मद उसे अपने तम्बू में ले गया.

अबू अयूब का भय

 अगले दिन प्रातः मोहम्मद को कुछ हलचल प्रतीत हुई. उसने बाहर आ कर देखा कि अबू अयूब नंगी तलवार लिए सारी रात वहाँ रक्षा करता रहा था. मोहम्मद के पूछने पर उस ने कहा,"ऐ नबी, मुझे लगा कि लड़की युवा है और कल तक जिस किनाना की पत्नी थी, उसे आप ने काट दिया है. मुझे उस पर भरोसा नहीं था, इसलिए मैंने निर्णय किया कि मैं निकट हे रहूँगा, कहीं वो आप के विरुद्ध कुछ न कर सके. मोहम्मद उस से प्रसन्न हुआ और उसे निश्चिन्त हो कर जाने को कहा.

अन्य स्त्रोतों से पुष्टि 

ये कथानक ऐसा है कि सहजता से इस पर विश्वास नहीं होता. कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने अपने मन से एक कहानी घढ़ ली हो कि किसी सम्प्रदाय विशेष को मलीन कर दे.
इस कि सच्चाई स्थापित करने के लिए हमें इस्लाम के एक सर्वमान्य स्त्रोत इमाम बुखारी कृत हदीस का हवाला देना पड़ेगा.:
बुखारी खंड १, पुस्तक संख्या ८, क्रमांक 367: अब्दुल अज़ीज़ के अनुसार:
अनास ने कहा, 'जब अल्लाह के पैगम्बर ने खैबर पर आक्रमण किया, हम सब ने प्रातःकाल अंधकार में ही फज्र प्रार्थना की.  पैगम्बर और अबू ताल्हा सवारी कर रहे थे और मैं भी अबू ताल्हा के पीछे सवार था. जिस समय रसूल ने खैबर की एक गली को शीघ्रता पार की तब मेरा घुटना उन कि जांघ को छुआ.  जब वह बस्ती में पहुंचे तो बोले, " अल्लाहु अकबर! खैबर का नाश हो गया. जिन्हें चेतावनी दी जा चुकी हो, जब हम ऐसे आक्रामक राष्ट्रों के निकट पहुँचते हैं तो उन की प्रभात बुरी होती है". उसने इस वाक्य को तीन बार दोहराया. लोग अपने कार्य छोड़ कर बाहर आ गए और कहने लगा, ' मोहम्मद आया है'. हमारे कुछ साथियों ने जोड़ा, ' अपनी सेना के साथ'. हमने खैबर को विजय किया, बंदी बनाये और लूट का सामान एकत्रित कर लिया. दिह्या आया और बोला,' ऐ अल्लाह के पैगम्बर! मुझे इन बंदियों में से एक लड़की गुलाम बनाने के लिए दीजिये. पैगम्बर ने कहा, ' जाओ और एक लड़की चुन लो'. इस पर उस ने साफिया बिन्त हुयाये को चुन लिया. इतने में एक आदमी पैगम्बर के पास आया और बोला,' ऐ अल्लाह के पैगम्बर! आप ने सफिय्या बिन्त हुयाये दिह्या को सौंप दी है. वो इस कबीले के मुखिया की बेटी है औत वह आप के अतिरिक्त किसी के योग्य नहीं है.’ इस पर पैगम्बर ने कहा, उसे उस लड़की के साथ यहाँ लाओ. तत्पश्चात दिह्या सफिय्या के साथ वहां पहुंचा. जब पैगम्बर ने सफिय्या को देखा तो उस ने दिह्या से कहा,' इसे छोड़ कर कोई अन्य लड़की गुलामी के लिए चुन लो. इस के बाद, अनास के अनुसार, पैगम्बर ने सफिय्या को रिहा कर उस से विवाह कर लिया.
थाबित ने अनास से पूछा, ' ओ अबू हम्ज़ा! पैगम्बर ने उसे मैहर में क्या दिया?' अनास ने उत्तर दिया,' उस लड़की का गुलामी से मुक्त होना ही उस का मैहर था. अनास के अनुसार, उम सुलैम ने जाते समय उसे विवाह के लिए सजाया और रात को उसे दुल्हन के रूप में पैगम्बर के पास भेज दिया.’ दूल्हा बने पैगम्बर ने एक चमड़े से बनी हुई चादर बिछाई और कहा,' जिस के पास जो भी खाना है वो ले आये.' कुछ लोग खजूरें और कुछ लोग मक्खन ले आये. उन्होंने हैस (एक प्रकार का व्यंजन) बनाया. यह भोजन पैगम्बर का वालिमा था.’
सूचना : वालिमा उस भोज को कहते हैं जो दूल्हा दुल्हन के एक रात साथ बिताने के पश्चात् कराया जाता है.

बुखारी, खंड ५, पुस्तक ५९, क्रम संख्या ५२२ में अनास बिन मलिक द्वारा वर्णन है:
हम खैबर पहुंचे, और जब अल्लाह ने अपने पैगम्बर को फतह करने में मदद की, उस समय किसी ने साफिया बिन्त हुयाये बिन अख्ताक, जिस के पति को मार दिया गया था, की सुन्दरता का वर्णन अल्लाह के पैगम्बर को किया. पैगम्बर ने उसे अपने लिए चुन लिया और उसे वहां से अपने साथ ले गया. जब हम 'सिदद अस सहबा' नामक स्थान पर पहुंचे, तब तक सफिय्या मासिक धर्म से पवित्र हो चुकी थी; तत्पश्चात अल्लाह के पैगम्बर ने उस से विवाह कर लिया. एक चमड़े के टुकड़े पर 'हैस' पका कर परोसा गया. तब पैगम्बर ने मुझ से कहा,'मैं तुम्हारे आस पास के लोगों को आमंत्रित करता हूँ'. तो यह था पैगम्बर और सफिय्या के विवाह का 'वालिमा'. इस के उपरांत हम मदीना की और चल पड़े. मैंने पैगम्बर को अपने ऊँठ पर एक गद्देगर आसन बनाते देखा ताकि सफिय्या उस पर बैठ सके. तत्पश्चात वेह अपने ऊँठ के पास बैठ गया और उसने अपना घुटना आगे किया ताकि सफिय्या उस पर पाँव रख कर ऊँठ पर सवार हो सके.

जब मुसलामानों ने लूट का माल बांटना आरम्भ किया तो उन्होंने पाया कि खैबर की लूट का माल उनकी अभी तक की सब लड़ाइयों से अधिक था. मोहम्मद ने अपने पांचवें भाग से (मोहम्मद ओर कुरान के अनुसार लूट का पांचवां भाग मोहम्मद के लिए है जिसे खम्स कहते हैं) अपनी बीवियों, उपसृयों, बेटियों और उनके बच्चों तथा मित्रों, यहाँ तक कि नौकरों को धनवान बना दिया. १४०० लड़ाकों के लिए १८०० भाग किये गए क्योंकि लूट की बाँट के नियमों के अनुसार हर लड़ाके के लिए एक भाग और घोड़े के लिए दो भाग रखे जाते थे. इस विजय से प्राप्त संपत्ति के लुप्त हो जाने का भी भय नहीं था क्योंकि यहूदियों ने भूमि जोतने के लिए वहीँ रहना था जब कि  उस पर अधिकार लूटने वालों का था.
 
मोहम्मद की जीवनी लिखने वाले मार्गोलिउथ के अनुसार सफिय्या उस का मोहम्मद द्वारा दिया गया नाम था. सफिय्या एक अरबी भाषा का शब्द है जिस का अर्थ है लुभावना टुकड़ा. कदाचित इस पर टिपण्णी न करना ही उचित है.

यहाँ उल्लेखनीय है कि खैबर के निवासियों को अपने स्थान पर बने रहने की अनुमति मोहम्मद ने उन्हें खरज गुज़ार की भांति रहने के लिए दी थी. इसलिए खैबर वासी इतिहास के प्रथम खरज गुज़ार थे. इस का अर्थ था कि वे अपनी ही भूमि पर जो उपजायेंगे, उस में से अपने जीवन यापन के लिए निकाल कर शेष पर मुसलामानों का अधिकार होगा. यही नहीं, उन कि संपत्ति पर भी मुसलामानों का अधिकार होगा. परिणाम स्वरुप, अगले कुछ वर्ष तो यहूदी खैबर में परतंत्रता के जीवन जीते रहे किन्तु फिर मुसलामानों द्वारा उन्हें वहाँ से निष्कासित कर दिया गया. केवल उन्ही को रहने की अनुमति मिली जो मुसलमान बन गए.
जो लोग इस शब्द से अनभिज्ञ हैं, भारत में जब इस्लामी शासन आरम्भ हुआ, हिन्दुओं को खरज गुज़ार की भांति जीवन व्यतीत करना पड़ता था.

स्त्रोत: सही बुखारी , Life of Mahomet - William Muir, इब्न इस्हाक, Mohammad and the rise of Islam - Margoliouth

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

सूफीगिरी का सच

भारत के विभाजन के पश्चात् बचे हुए भारत में सरकारी तंत्र ने अवसरवादी इतिहासकारों और मार्क्सवादियों के साथ मिल कर ऐसा भ्रामक प्रचार किया है कि जन साधारण को लगता है कि सूफी ऐसे मुसलमान थे जो संकीर्ण साम्प्रदायिकता से ऊपर उठे हुए थे और हिन्दुओं के प्रति उदारवादी विचार रखते थे. इसका परिणाम है कि तथ्यों के देखने के उपरान्त भी सहसा विश्वास नहीं होता कि दुष्प्रचार का ऐसा षड़यंत्र कैसे रचा जा सकता है. 
हिंदुयों की उदार प्रवृति का लाभ उठाते हुए ये तथाकथित संत नगरों में जा बसते थे. वहाँ सूचना एकत्रित कर के इस्लामी आक्रान्ताओं को सुगम मार्गों सहित अन्य जानकारियाँ प्रदान करने का कार्य करते थे. आक्रान्ताओं की विजय के पश्चात मंदिर और मूर्तियाँ तोडना और उठा कर लायी गयी हिन्दू राजकुमारियों अथवा लड़कियों से दुष्कर्म भी करते थे.
इस अंक में केवल मुसलमान इतिहासकारों की पुस्तकों के अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि झूठ पर से पर्दा उठाया जा सके.


सियार उल औलिया


मोइनुद्दीन  चिश्ती

इस सूफी की जीवनी है 'सियार उल औलिया', जिसे 'मीर खुर्द' (सईद मोहम्मद बिन मुबारक बिन मोहम्मद अल्वी किरमानी) ने लिखा है. वो निजामुद्दीन औलिया का अनुयाई था. उसने दिल्ली में औलिया और उस के मुख्य अनुयाइयों की जीवनी लिखी थी. यहाँ दिए गए अंश सियार उल औलिया के अनुवाद में से लिए गए हैं. (Cited in P.M. Currie, The Shrine and Cult of Mu‘in al-Dîn Chishtî of Ajmer, OUP, 1989, p. 30.)
शेख  मोइनुद्दीन चिश्ती के सन्दर्भ में लिखा है:
दूसरा आश्चर्य (करिश्मा) यह है कि उस के आने से पहले पूरा हिन्दुस्तान कुफ्र और मूर्तिपूजा में डूबा हुआ था. हिंद का प्रत्येक अभिमानी व्यक्ति स्वयं को इश्वर समझता था और अपने आप को इश्व्वर का सांझेदार मानता था. भारत के सभी निवासी पत्थरों, मूर्तियों, पशुयों, गाय और गोबर के प्रति शीष झुकाते थे. इस नास्तिकता (बेईमानी) के अन्धकार ने उन के ह्रदय बंद और कठोर कर दिए थे.
सम्पूर्ण भारतवर्ष दीन (इस्लाम) के आदेश और न्याय से अनभिज्ञ थे. सभी अल्लाह और उस के रुसूल से अनजान थे. किसी ने काबा नहीं देखा था और अल्लाह की महानता से अनजान थे.
मोइनुद्दीन के आने से, जो कि ईमान वालों का सूर्य है, सम्प्रदाय का सहायक है, इस राष्ट्र की नास्तिकता का अन्धकार इस्लाम के प्रकाश से चमक उठा.
"उसकी तलवार की शक्ति से, कुफ्र की इस भूमि पर अब मूर्तियों और मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें, मेहराब और मीनारें बन गयी हैं. जिस भूमि में मूर्ती पूजा करने वालों के शब्द सुनाई पड़ते थे, अब वहाँ 'अल्लाहु अकबर' सुनाई देता है".
"जिन्हें मुसलमान बना दिया गया है, उनके वंशज और उनके भी जो तलवार की नोक पर अन्यों को इस्लाम में लायेंगे, क़यामत के दिन तक यहाँ रहेंगे. क़यामत के दिन तक वो शेख अल इस्लाम, मोइनुद्दीन हसन के ऋणी रहेंगे और ये लोग शक्तिशाली अल्लाह के निकट आ जायेंगे. ये सब मोइनुद्दीन की वफादारी का परिणाम है".


सियार उल अरिफिन

शेख जलालुद्दीन तबरीज़ी  (सन ११४३ - १२३३)
 
सुहार्वार्दिय्या सिलसिले का एक सूफी 'हामिद बिन फजलुल्लाह' था, जिसे दरवेश जमाली कम्बोह देहलवी के नाम से भी जाना जाता है. इस ने सियार उल अरिफिन नामक संकलन लिखा है. इस में उस के अपने सिलसिले और चिश्ती सिलसिले के लोगों के संबंध में वर्णन है. इस में वो शेख जलालुद्दीन के संबंध में लिखता है:-
 वो सुहार्वार्दी सिलसिले के स्थापक शेख शहाबुद्दीन सुहार्वार्दी का दूसरा सबसे योग्य अनुयाई था. मुल्तान, बदौन और दिल्ली में रहने के पश्चात् वो बंगाल में लखनौती में, जिसे गौर भी कहते हैं, रहने लगा.  
"शेख जलालुद्दीन के बंगाल में कई अनुयाई थे. वो पहले लखनौती में रहता था जहां उस ने एक खानकाह बनायी और लंगर लगाने लगा. उस ने कुछ उद्द्यान (बागीचे) भी ले लिए. वहाँ से वो उत्तरी बंगाल में पन्दुआ के निकट देवतला (देव महल) में जा बसा. वहाँ एक काफिर (हिन्दू अथवा बोद्ध) ने एक विशाल मंदिर और एक कूप बना रखा था. शेख ने उसे गिरा दिया और एक ताक़िया (खानगाह) बना दी, और बहुत से काफिरों को मुसलमान बना दिया. इस के पश्चात देवताला को तब्रिज़बाद के नाम से जाना जाने लगा और अनेक ईमान वाले लोग यहाँ आने लगे".
 
शेख अबू बकर तुसी हैदरी (तेरहवीं शताब्दी)
 
हैदरी संप्रदाय हैदर नामक तुर्की के नाम से चला है और शेख अबू बकर इसी संप्रदाय का अनुयाई था. उस के संबंध में लिखा है:
शेख अबू बकर तुसी हैदरी, जो तेरहवीं शताब्दी के मध्य में दिल्ली में आ बसा था, हैदरी घराने का एक प्रमुख अनुयाई था. उसने दिल्ली में यमुना नदी के किनारे एक मंदिर गिराया और उस पर खानगाह बना दी जहां वो समां बैठकें किया करता था. शेख निज़ामुद्दीन औलिया और हांसी का शेख जमालुद्दीन उसे मिलने दिल्ली आया करते थे. जमालुद्दीन ने शेख अबू बकर को उसकी उपलब्धियों के लिए बाज़ - इ - सफ़ेद की उपाधि दी. 
 
सियार अल अक्ताब
ये पुस्तक अल्लाह दिया चिश्ती नामक चिश्तिया सिलसिले के लेखक की है और इस में मुख्यतः चिश्तिया और सबरिया सिलसिले के सूफियों से सम्बंधित जानकारी है. 
इस में मोइनुद्दीन चिश्ती के संबंध में लिखा है:
 
शेख मोइनुद्दीन चिश्ती सन १२३६ - अजमेर (राजस्थान)

हालाँकि इस समय झील के आस पास कई मंदिर थे जिन में मूर्तियाँ रखी थीं, जब ख्वाजा (मोइनुद्दीन) ने उन्हें देखा तो कहा,"यदि अल्लाह और मोहम्मद ने चाहा तो शीघ्र ही मैं इन मूर्तियों और मंदिरों को धुल में मिला दूंगा“.
"ऐसा कहा जाता है कि उस समय वहाँ एक ऐसा मंदिर था जिस के प्रति विशेष श्रद्धा थी और इस में राजा और सभी काफिर आते थे. इस की देख भाल के लिए भूमि भी प्रदान की गयी थी. जब ख्वाजा ने वहाँ जा कर रहना आरम्भ किया तो उस के सेवक प्रति दिन एक गाय वहाँ लाते थे और उसे काट कर खा जाते थे.
जब काफिरों ने अल्लाह के इस विशिष्ट साथी को देखा तो वे अपने आप को असहाय और निर्बल समझने लगे तो वो अपने मूर्ती मंदिर में गए. वहाँ एक देव था, जिस के समक्ष उन्होंने सहायता की मांग की. 
"ये देव उन का मुखिया था. जब उस ने ख्वाजा की भव्यता को देखा तो वो सर से पाँव तक कापने लगा. वो जितना भी राम राम बोलने का प्रयत्न करता, उस के मुख से 'रहीम रहीम' ही निकल रहा था. खवाजा ने अपने हाथ से पानी का एक प्याला एक सेवक के हाथों देव को भेजा. उसे पीते ही, उसके ह्रदय से कुफ्र का अन्धकार दूर हो गया और वो ख्वाजा के स्वर्ग (जन्नत) जाने वाले चरणों में गिर पड़ा और इस्लाम अपना (कबूल) लिया. 
ख्वाजा  ने कहा कि मैं तुम्हारा नाम शादी देव रखता हूँ. शादी देव ने कहा कि वो इसी नगर में अपना निवास स्थान बनाए ताकि यहाँ के निवासी उस के पवित्र आगमन का लाभ उठाये. ख्वाजा ने उस की बात स्वीकार कर ली और अपने विशेष सेवक मोहम्मद याद्गीर से नगर में एक उचित स्थान खोजने को कहा ताकि फकीरों के लिए एक उचित स्थान बनाया जा सके. मोहम्मद याद्गीर नगर में गया और वो स्थान चुना जहां आज ख्वाजा की मज़ार है. उस समय ये स्थान शादी देव् का था.
मोइनुद्दीन ने एक दूसरी बीवी रखी, जिस का कारण इस प्रकार है - 
"एक दिन उस के सपने में मोहम्मद प्रकट हुआ और उस ने कहा कि तुम मेरे सम्प्रदाय के अनुयाई तब तक नहीं हो सकते जब तक तुम मेरा पूरी तरह अनुसरण नहीं करते". उन्ही दिनों पाटली दुर्ग के शासक मलिक खिताब ने काफिरों पर आक्रमण किया और राजा की पुत्री को उठा कर ले आया. ये कन्या उस ने मोइनुद्दीन को भेंट (तोहफा) के रूप में दी जिस ने उसे अपना कर उस का नाम 'बीबी उमाय्या' रख दिया".
 उल्लेखनीय है कि मोहम्मद ने दो युवतियों सफिय्या और जुवैरिय्या के पतियों का वध कर/करवा के उन से निकाह कर लिया था और एक युवती रेहाना को अपना गुलाम बना लिया था. इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए इस्लामी आक्रान्ताओं ने हिन्दू स्त्रियों को अपने हरम में सम्मिलित कर लिया था. 
पी एम् क्युरी के अनुसार “विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि मोनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का जो बुलंद दरवाज़ा है, उस में हिन्दू मंदिरों के तराशे हुए पत्थरों का प्रयोग किया गया है. उस की मज़ार एक भूतपूर्व मंदिर के भाग के ऊपर बनी है. अनीस अल अर्वाह के अनुसार जो संदल खाना है वो शादी देव के मंदिर के ऊपर बना हुआ है.

बहार - ऐ-  आज़म

अगले चार सूफियों के कारनामे सन १८२३ के हैं. इस समय आज़म जाह बहादुर कर्णाटक के सिंहासन पर नवाब वालाजाह के उत्तराधिकारी के रूप में बैठा था. ये घटनाएं बहार - ऐ-  आज़म नामक कृति में अंकित हैं जब नवाब अपने लाव लश्कर के साथ सफ़र पर निकला था. इसमें लेखक 'गुलाम अब्दुल कादिर नज़ीर' जो उसके महल का मुंशी था बताता है कि उस के काफिले के मुसलमान जब चिदंबरम में हिन्दू मंदिरों में जाने लगे तो नवाब आग बबूला हो गया था. उस ने वहाँ के अँगरेज़ अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया कि किसी भी मुसलमान को मंदिर में न जाने दिया जाए. आगे वो बताता है कि किस प्रकार वो हिंदुयों की लड़कियों को नचाते हुए, संगीत सुनते हुए आगे बढे. इस में कई सूफियों के नाम हैं जिन्होंने उत्तरी और दक्षिण आर्कोट, तिरुचिरापल्ली तथा तंजावुर में मस्जिदें बनवाई. जो इस में नहीं लिखा वो ये है कि इस समय तक वो केवल नाम का ही नवाब रह गया था क्योंकि १८०१ में ही उन का प्रदेश अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया था और ये नवाब अंग्रेज़ों के टुकड़ों पर पल रहा था. मस्जिदें कैसे बनी थीं उन का अनुमान लगाया जा सकता है.


सूफी नत्थर वाली 

कहते हैं कि पुराने दिनों में त्रिचिला में एक तीन सर वाला राक्षस, जो कि रावण का भाई था, इस क्षेत्र पर अधिकार करने आ पहुंचा. कोई मनुष्य उसका सामना नहीं कर सकता था और सब और उस का दबदबा था. किन्तु मोहम्मद के कथन के अनुसार, "इस्लाम को कोई नहीं रोक सकता", यहाँ हज़रत नत्थर वाली के प्रयत्नों से दीन ने जड़ें पकड़ ली. राक्षस मारा गया. उस की मूर्ती जिसे काफिर 'बुत लिंग' कह कर पूजते थे काट कर सर धड़ से विलग कर दिया गया. धड़ का भाग भूमि में समा दिया गया और उस स्थान पर वाली की मज़ार है जो आज तक प्रकाशमान है.


सूफी शाह भेका 

जब शाह भेका त्रिचिनोपोली में था, तो काफिर, जो उसे नापसंद करते थे, उसे सताने लगे. एक दिन जब वो अत्यंत क्रोधित था, वो हिंदुयों के मंदिर के बाहर एक बैल, जिसे हिन्दू स्वामी कह कर पूजते थे, पर चढ़ गया और अल्लाह की शक्ति से वहाँ से हटा दिया. हिन्दू वहाँ से चले गए और उस ने वो सारी भूमि शाह को भेंट कर दी.
 

सूफी कायिम शाह 

कायिम शाह हिंदुस्तान आया. वो बारह मंदिरों के विनाश का कारण बना. वो एक लम्बी आयु तक जीवित रहा.
  ये एक दुर्लभ अंश है जहां हमें एक सटीक गणना मिलती है, अन्यथा अधिकतर स्थानों पर अस्पष्ट संकेत मिलते हैं जैसे कि 'कई मंदिर तोड़े'.


सूफी नूर मोहम्मद कादिरीवेल्लोर (तमिल नाडू)


हज़रत नूर मोहम्मद कादिरी अपने समय में एक विशेष व्यक्ति माना जाता था. वो बहुत से मंदिरों के विनाश का कारण बना. इन में से कई तो सदा के लिए नष्ट हो गए. उसने अपने दफनाने का स्थान एक मंदिर में चुना था. हालाँकि उसे मरे ५०० वर्ष बीत गए हैं किन्तु लोग आज भी उस की प्रशंसा करते हैं.
 
तारीख - ऐ - कश्मीर 

सूफी मीर शमसुद्दीन इराकी (कश्मीर)

बाबा उचाह गनई अपने लिए एक मार्गदर्शक (पीर ऐ कमाल) की इच्छा से मक्का और मदीना की परिक्रमा करने के लिए गया था. उस ने अल्लाह से सहायता के लिए नमाज़ की तो उसे एक अनजान स्वर सुनाई दिया कि पीर ऐ कमाल 'हज़रत शेख' तो कश्मीर में ही है. बाबा कश्मीर आ गया और अचानक उस की दृष्टि एक पूजा स्थल पर पड़ी जो कि हिंदुयों का मंदिर था. उस के होंठों पर एक मुस्कान आ गयी. उस के अनुयाइओन ने मुस्कान ka कारण पूछा तो उस ने कहा कि इन मंदिरों और मूर्तियों का विनाश शेख शमसुद्दीन इराकी के हाथों से होगा और ये मंदिर पूर्ण रूप से वीरान हो जायेंगे. सभी काफिर इस्लाम के पथ पर आ जायेंगे. कुछ ही समय पश्चात शमसुद्दीन कश्मीर पहुँच गया और उसने मंदिरों को तोड़ना आरम्भ कर दिया. शमसुद्दीन कुब्रविय्या सिलसिले का सूफी था और १५०५ में सुलतान फ़तेह शाह के शासन काल में नूर बख्श सिलसिले का सदस्य बन कर कश्मीर आया था.

यदि संत कहे जाने वाले सूफियों का इतना क्रूरतापूर्ण व्यवहार है तो सिपाहियों और सुल्तानों का तो क्या कहना. 

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

आमिर खुसरो का उदारवाद

यदि किसी नीच व्यक्ति को एक सम्मानजनक मुखौटा प्रदान करना हो तो दो उपाय करने चाहियें. सर्वप्रथम, उस का नाम अच्छे और नेक व्यक्तियों के साथ उल्लेखित कर दीजिये. और यदि इसके लिए आप गुरु नानक और संत कबीर जैसे नेहरु रचित 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में आमिर खुसरो के संबंध में लिखा है:
वो एक महान संगीतकार था तथा उसने भारतीय संगीत में कई नई खोजें की. कहा जाता है कि सितार उसी की देन है. उस ने कई विषयों पर लिखा है विशेषतः भारत की प्रशंसा में, जिस में उस ने उन विषयों के संबंध में बताया है जिन में भारत अग्रणी है. इन में है धर्म, दर्शन, तर्क, भाषा, व्याकरण, संगीत, गणित, विज्ञान एवं आम!
नेहरु जिस समय लिखते थे, लोगों के मानस पटल पर उस की छवि एक नेक और देश भक्त नेता के रूप में थी. जो सूचना के साधन थे वो सीमित थे और उन पर सकारी तंत्र का अधिकार था. इस सब की आड़ में वो जो लिखता था, उसे पढ़ कर लोग स्वयं को बुद्धि जीवी समझ लेते थे. प्रत्येक प्रबुद्ध समाज को चाहिए कि समीक्षा के उपरान्त ही शब्दों को तथ्य के रूप में स्वीकार करे.
हर भारतीय को पता होना चाहिए कि जिस आमिर खुसरो के संबंध में नेहरु इतनी पुष्पित वाणी का प्रयोग कर रहा है, भारतीयता के इस प्रेमी ने हमारे संबंध में क्या लिखा है. आमिर खुसरो की दो कृतियाँ हैं - आशिका तथा 'तारीख - ऐ - अलाई '. ये दोनों फारसी में हैं.आशिका का देवनागरी अनुवाद इस प्रकार है:-
प्रसन्न हिंदुस्तान, जहां सम्प्रदाय की महानता और न्याय पूर्ण रूप से आदर प्राप्त करता है और सुरक्षित है. ज्ञान में अब दिल्ली बुखारा के समकक्ष है क्योंकि संप्रदाय के राजाओं ने इस्लाम को स्थापित कर दिया है. ये सम्पूर्ण राष्ट्र, हमारे मुजाहिदों की तलवारों से ऐसा हो गया है मानो कि आग की सहायता से वन के सभी कांटे जल गए हों. भूमि तलवार से निकले रक्त से परिपूर्ण हो गयी है, और काफिर भाप बन कर बिखर गए हैं. भारत के बलवान पुरुष पाँव तले रौंद दिए गए हैं, और सभी जज़िया देने को बाध्य हो गए हैं. यदि जज़िया दे कर अपना जीवन बचाने का प्रावधान न होता तो हिंद का नाम, मूल और टहनियों सहित, नष्ट हो चुका होता. घजनी से ले कर सागर के किनारों तक आप सब स्थानों पर सब कुछ इस्लाम के अधीन है. कांव कांव करने वाले कव्वे (हिंदुयों के लिए आमिर खुसरो का विशेषण) अपनी ओर तीरों की नोक नहीं देखते; न ही ऐसा कोई इसाई है जो दास को अल्लाह के समकक्ष कहने से भयभीत न होता हो; न कोई यहूदी है जो अपनी पुस्तक को कुरान के समान कहता हो; न कोई मगली है जो अग्नि की पूजा कर के प्रसन्न हो सके, जिसके लिए अग्नि अपने सैंकड़ों मुख खोलती हो. मुसलामानों के चारों पंथ मैत्री से रहते हैं और सुन्नी सर्वोपरि हैं.
भारत के मूल निवासियों के प्रति खुसरो के विचार कितने उदारता वादी थे, ये तो स्पष्ट हो जाता है. वो यहाँ के धर्म की प्रशंसा किस प्रकार करता था ये भी देख लीजिये.
इन (ब्राह्मणों) की चार पुस्तकें हैं, जिन्हें ये दोहराते रहते हैं. इन पुस्तकों को बेद (वेद) कहते हैं. इन्हें पढने से कोई लाभ नहीं होता.
खलीफा की तलवार की जिव्हा ने, जो कि इस्लाम की अग्नि है, हिंदुस्तान के अन्धकार को अपने मार्गदर्शन से प्रकाश में परिवर्तित कर दिया है. दूसरी ओर सोमनाथ के ध्वस्त मंदिर से इतनी धुल उठी कि सागर भी उसे समेत नहीं पाया. दायीं से बायीं ओर, सेना ने सागर से ले कर दुसरे सागर तक विजय प्राप्त कर ली है. हिंदुयों के भगवानों की कई राजधानियां, जिन में शैतानियत जिन्नों के समय से चली आ रहित थी, नष्ट कर दी गयी हैं. कुफ्र की ये घृणित अशुद्धि का विनाश सुल्तान द्वारा इन की मूर्तियाँ और मंदिर गिरा कर किया गया है, जिस का आरम्भ देवगिर के विरुद्ध जिहाद से हुआ है. न्याय का प्रकाश इन सभी नापाक (अपवित्र) राज्यों में होगा जब नमाज़ के लिए पुकार लगाई जायेगी और नमाज़ पढ़ी जाएगी. अल्लाह महान है.
जब चित्तोड़ में अल्लाउद्दीन खिलजी  ने ३०,००० हिंदुयों का नरसंहार करने का आदेश दिया था तो आमिर खुसरो इस का व्याख्यान अपने 'खजाना - उल - फ़तेह (1311) में लिखता है -
"सुल्तान ने, अपनी काफिरों को काटने वाली तलवार से,  इस्लाम की सीमा में से हिंदुस्तान के सभी मुखियायों का वध करने का आदेश दिया. यदि आज कोई काफिर अपने धर्म का अधिकार मांगे तो सुन्नी अपने अल्लाह के इस खलीफा की सौगंध खा कर कहेंगे कि ऐसे किसी विधर्म अथवा विधर्मी का कोई अधिकार नहीं है".
खुसरो की एक कृति है 'मिफ्तह उल फ़तेह'. इस में उस ने फ़िरोज़ शाह खिलजी द्वारा किये गए आक्रमणों की व्याख्या की है. इस में बखान है कि किस प्रकार युद्ध में हिंदुयों से व्यवहार किया जाता था.
"मुसलामानों ने अपनी तलवारों को हिंदुयों के रक्त से जंग लगा लिया था".
जितने भी जीवित हिन्दू  राजा के हाथ लगे, उन्हें हाथियों के पाँव तले रौंद कर टुकड़े टुकड़े कर दिया गया. जो मुसलमान हाथ लगे, उन्हें जीवन दान दे दिया गया.
दो सप्ताह तक पर्वतों में से चलते हुए शाह रणथम्बौर    की सीमा पर पहुंचा. तुरुष्कों (शाह की सेना के तुर्की मुसलमान) ने लूट पाट मचाना आरम्भ कर दिया.  शाह ने अपने घुड़सवारों को सूचना एकत्रित करने के लिए भेजा. चार प्रसंग के घेरे में जितने हिन्दू थे, सब को मार दिया गया अथवा बंदी बना लिया गया.
यहाँ से कड़ी खान को कुछ धनुष धारियों के साथ पहाड़ों में जांच पड़ताल के लिए भेजा गया. वहाँ लगभग ५०० हिंदुयों ने अचानक आक्रमण कर दिया जो हिंदी में कह रहे थे 'मारो!मारो'. तुरुष्कों के विषयुक्त बानों से ७० मारे गए, ४० घायल हो गए और शेष भाग खड़े हुए. सैनिकों ने शिविर में लौट कर शाह को इस की सूचना दी. अगले दिन शाह ने १,००० सैनिकों को मलिक खुर्रम आरिज़, मलिक कर्फ्बक, मलिक कत्लागितिगिन, इतजाम मुबारक, अहमद सर्जंदर, महमूद सर्जंदर और अन्यों के साथ भेजा. वे पूरी रफ़्तार से झेन से दो प्रसंग की दूरी पर पहुँच गए. जब वे वहाँ एक संकरे राह से निकल रहे थे तो इस सूचना से झेन में खलबली मच गयी. राय घबरा गया और उस ने गुर्दान सैनी को बुला भेजा जो राय के ४०,००० रावतों में सब से अनुभवी योद्धा था और हिंदुयों के कई युद्ध देख चुका था. कई बार वो मालवा, और कई बार गुजरात में लूट चुका था. वो १०,००० रावतों के साथ झेन से तुरुष्कों पर आक्रमण करने निकला. भीषण युद्ध के उपरान्त वो वीर गति को प्राप्त हुआ. तत्पश्चात हिन्दू भाग खड़े हुए. तुरुष्कों ने पीछा कर के भारी मात्र में उन की हत्या कर दी और कुछ बंदी बना लिए.  शाह की सेना में केवल एक व्यक्ति घायल हुआ. झेन में आतंक फ़ैल गया और रात में राय और सभी हिन्दू  रणथम्बौर के पहाड़ों में भाग गए. विजयी शाही सेना लूट के सामान के साथ शाह के पास पहुंची. उन्होंने शाह को लूट का माल भेंट किया, जिस में काट कर लाये हुए सर थे, कवच, घोड़े, तलवारें और बंदी रावत थे. शाह ने उन्हें लूट का माल अपने पास रखने दिया और सोना तथा प्रशंसा के चोले बांटे. तीन दिन पश्चात शाह ने दोपहर को झेन में प्रवेश किया और राय के निजी कक्ष में अपना निवास बनाया, जहां उसने पत्थरों में कई भव्य रंगों से की गयी तराशी की प्रशंसा की जिन में आकृतियाँ  इस सुन्दरता से घड़ी गयी थी मानो मोम से बनायी गयी हों. उन पर इतना सुन्दर लेप किया गया था कि देखनइ वाले को अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देता था. चन्दन को घोल कर गारा बनाया गया था. उत्कृष्ट काष्ठ (लकड़ी) का उपयोग किया गया था.
 इस के पश्चात् वो मंदिरों में गया जहां सोने और चांदी से विस्तृत अलंकारिक (सजावटी) कलाकारी की गयी थी. अगले दिन वो फिर मंदिर में गया और उसने मंदिरों और दुर्ग (किला) को नष्ट करने का आदेश दिया तथा राजमहल को जलाने का आदेश दिया, और इस प्रकार स्वर्ग (जन्नत) को नरक (जहन्नुम) में परिवर्तित कर दिया.
झेन की नींव नष्ट कर दी गयी. शाह के हाथियों पर इतना सोना लाड दिया गया था कि जिस का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता. सैनिकों ने इतना माल लूटा कि भिखारी भी समृद्ध हो गए थे, क्योंकि प्रत्येक ध्वस्त खंडहर में से धन के अम्बार मिल रहे थे. जब सैनिक धन और सोना लूट रहे थे तब शाह मंदिरों को जलाने और मूर्तियों को नष्ट करने में लगा था. वहाँ ब्रह्मा की दो मूर्तियाँ थी जिन में प्रत्येक का भार १००० मन से अधिक था. इन के टुकड़े कर के अधिकारिओं और सैनिकों में इस आदेश के साथ बाँट दिए गए कि इन्हें मस्जिद के द्वार पर फेंका जाए. (ज्ञात हो कि इस का उद्देश्य था कि मुसलमान इन के ऊपर से पाँव रख कर जाएँ जिस से कि हिन्दुओं को नीचा दिखाया जाए और हिन्दू धर्म का अपमान हो).
इसके पश्चात् मलिक खुर्रम काफिरों के पीछे पहाड़ियों में लपका जहां उस ने अनगिनत बंधक बनाए. एक अन्य गिरोह को सर्जंदर की अध्यक्षता में चम्बल और कुवारी के पार मालवा को लूटने और काफिरों का रक्त बहाने के लिए भेजा गया. कुवारी के पार दो प्रसंग के अंतर पर उसे एक समूह मिल गया जो मलिक की तलवार से बच गया था. यहाँ उस ने इतनी लूटपाट की कि मैं वर्णन नहीं कर सकता. मुबारक बर्बक को एक अन्य दिशा में भेजा गया था, जहां उस ने भी परंपरा के अनुसार लूटपाट की. मलिक जन्दर्बख्त अहमद ने एक अन्य दिशा में लूटपाट और नरसंहार (लारा के पर्वत से ले कर मारा की सीमा तक) किया. 
अल्लाउद्दीन खिलजी के संबंध में खुसरो लिखता है:
जब उसके भाग्य ने हाथ उठाया तो वो हिंदुस्तान का शासक बन गया. जब वो कार की राजधानी से चला तो भयभीत हिन्दू चींटियों की भांति पृथ्वी में चले गए. वो बिहार के उद्यान की दिशा में बढ़ा और वहाँ की भूमि को रक्त से लाल कर दिया. उसने उज्जैन की सड़क से घिनौने और नीच लोगो से रहित कर दिया और भीलसेन में आतंक मचा दिया. जब उसने उस प्रदेश में विजय प्राप्त की तो उस ने नदी में छिपाई गयी मूर्तियों को भी निकाल लिया जो उस से छिपाई गयी थी. ये तो उसका एक छोटा सा अभियान था, वो तो देव्गीर को जीतने का निश्चय कर चुका था, जहां उस ने देव पर विजय प्राप्त की. "उस के दया देखिये कि राय को पकड़ने के पश्चात् भी उसने छोड़ दिया". उसने मूर्तिपूजकों के मंदिर नष्ट कर दिए और उन के स्थान पर मस्जिद की मीनारें बना दी.
 ये घृणा से भरपूर रचनाएं कबीर अथवा गुरु नानक के उदारवादी विचारों से कहीं भी मेल नहीं खाती, इसलिए खुसरो को इन नेक पुरुषों की श्रेणी में खड़ा करना इन दोनों सज्जनों का अपमान करने के समान है. लेकिन नेहरु ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए पूरे राष्ट्र को उल्लू बनाने का प्रयत्न किया है, जिसमें वो सफलता प्राप्त कर पाया है.




सोमनाथ के मंदिर के विनाश के संबंध में खुसरो द्वारा कहे गए शब्द नेहरु के इस उदारवादी सूफी संत की विचारधारा पर और प्रकाश डालते हैं. महमूद गज़नी ने जब सोमनाथ के मंदिर को लूटा और नष्ट किया था तो उसने वहां की सभी मूर्तियाँ तोड़ दी थीं और मुख्य मूर्ती को अपने साथ गज़नी ले गया था. यहाँ पर पहले तो उसने कुरान का बखान किया और फिर सोमनाथ मंदिर के नष्ट किये जाने पर कहता है:-
ऐसा लग रहा था मानो शाही तलवार कुरान का वर्णन कर रही हो: 'इस प्रकार उसने (अब्राहम ने) मूर्तियों के टुकड़े टुकड़े कर दिए हों, केवल मुख्य मूर्ती को छोड़ कर.; इस प्रकार एक बुत परस्त राष्ट्र, जो कि काफिरों का मक्का था, अब इस्लाम के मदीना में बदल गया. 
ये विशाल और भव्य मंदिर जो समुद्र किनारे बना हुआ था, इसके टुकड़े, मंदिर की स्थिति के पश्चिम की ओर सागर में गिरे थे. इस पर ये कबीर और नानक के समकक्ष संत प्रसन्नता से कविता में वर्णन करता है:-
सोमनाथ के मंदिर को पवित्र मक्का की ओर मोड़ दिया गया, मंदिर ने अपना सर झुकाया और फिर सागर में डुबकी लगा गया. ऐसा लग रहा था मानों मंदिर ने पहले नमाज़ अदा की और फिर स्नान के लिए पानी में उतर गया.
चिदंबरम में शिव मंदिर और शिव लिंग के तोड़े जाने पर भी इस संत ने अपनी रचनाओं में कलात्मक ढंग से वर्णन किया है:
पत्थर की मूर्ती जिसे लिंग महादेव कहते हैं, लंबे अरसे से स्थापित थी जिस पर काफिरों की महिलाएं अपने अंग रगड़ कर अपनी वासना को शांत करती थीं, इस पर अब तक इस्लाम के घोड़े की लात से तोड़ने के लिए प्रहार नहीं हुआ था. मुसलामानों ने सारे लिंग तोड़ दिए और देव नारायण नीचे आ गिरा. अन्य सभी भगवान्, जो वहाँ थे, उन्होंने अपने पाँव उठाए और इतना ऊंचा कूड़े कि एक ही छलांग में लंका पहुँच गए. दर के मारे, लिंग भी अपने आप को बचाने के लिए भागते अगर उनके खड़े होने के लिए पाँव लगे होते.
 चिदंबरम में ये अकेला मंदिर नहीं था जिसे विनष्ट किया गया था. वहाँ के कई मंदिरों को मलिक काफूर की नेक इस्लामी तलवार का स्वाद चखना पड़ा था. उस समय नेहरु का ये संत आनंद से भर कर दृश्यों के बखान में बताता है कि 
ब्राह्मणों के सर उनकी गर्दनों से नाच नाच कर उनके पांवों में गिर रहे थे.